“वेश्यावृति”

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रात के सन्नाटों में
कई बाजार खुलते हैं
शहरों की अँधेरी गलियों में
ज़िस्म हज़ारों बिकते हैं
पहले जबरदस्ती से शायद
फिर आदतों के तले
वो हर रात बिकती है
पेट पालने के लिए
बदनाम है वो गुमनाम भी
चन्द पैसो में बेच रही ईमान भी
“रईसजादे” वहाँ ऐश उड़ाते फिरते
फिर “वेश्या” सिर्फ उसे ही क्यों कहते ?
सौदा अपने शरीर का करना
आसान तो ये काम नहीं
“बच्चा  पेट मे पल रहा है
पर बाप का नाम पता नहीं”
लाख गलत है वो तो
पर क्या तुम सही हो
इतनी घिन आती है तो
तुम वहाँ जाते ही क्यों हों?
ये पैदायशी पेशा नहीं उसका
ये बात बस जान लो”तुम”
वो लड़की है, सिर्फ़ लड़की
उसे वेश्या बनाते हो “तुम”

नेहा जोशी

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