AI Data Center आपके पानी और बिजली पर कब्ज़ा करने आ रहे हैं? देखिए कैसे

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AI डेटा सेंटर्स (ai data center india) तेजी से बढ़ रहे हैं और इसके साथ ही पानी व बिजली की खपत भी चिंता का विषय बनती जा रही है। बड़े-बड़े सर्वर फार्म को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है, जबकि 24×7 चलने वाले सिस्टम अपार बिजली खपत करते हैं।

भारत जैसे देश में, जहां पहले से ही पानी की कमी और बिजली पर दबाव है, यह एक बड़ी चुनौती बन सकता है। सवाल यह है कि क्या हमारी नीतियां, इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय नियम इस बढ़ते बोझ को संभालने के लिए तैयार हैं, या तकनीकी तरक्की की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ेगी?

भारत में डेटा सेंटर्स का असर विकसित देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है। इसके चार बड़े कारण हैं।

  1. सबसे बड़ी चिंता भारत की बिजली व्यवस्था को लेकर है। विकसित देशों में जहां डेटा सेंटर्स का बड़ा हिस्सा सोलर, विंड और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से संचालित हो रहा है, वहीं भारत का करीब 75 प्रतिशत बिजली ग्रिड अब भी कोयले पर निर्भर है। इसका सीधा असर कार्बन उत्सर्जन पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, मुंबई जैसे शहर में एक बड़े डेटा सेंटर का संचालन यूरोप की तुलना में लगभग दोगुना कार्बन फुटप्रिंट पैदा करता है।
  2. दूसरा बड़ा मुद्दा डीज़ल बैकअप जनरेटर का है। बिजली कटौती की स्थिति में डेटा सेंटर्स भारी क्षमता वाले डीज़ल जनरेटर चलाते हैं। दिल्ली-एनसीआर और मुंबई जैसे पहले से प्रदूषण झेल रहे घनी आबादी वाले इलाकों में इससे हवा की गुणवत्ता और बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है।
  3.  तीसरी और शायद सबसे संवेदनशील समस्या जल संकट से जुड़ी है। भारत के कई शहरों में 300 से 400 फीट तक बोरिंग करने के बाद भी पानी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे हालात में जब बड़े डेटा सेंटर्स को कूलिंग के लिए भारी मात्रा में पानी की प्राथमिकता दी जाती है, तो आसपास रहने वाले लोग टैंकरों पर निर्भर होने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।
  4. इसके अलावा नीतिगत खामियां भी चिंता बढ़ाती हैं। सरकार ने डेटा सेंटर्स को “Essential Services” घोषित कर इन्हें White Category में रखा है, जिसके चलते इनके लिए पब्लिक हियरिंग अनिवार्य नहीं होती। नतीजतन, स्थानीय समुदायों को अपनी आपत्तियां या चिंताएं सामने रखने का अवसर तक नहीं मिल पाता।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते बिजली, पानी और पर्यावरण से जुड़ी नीतियों में संतुलन नहीं बनाया गया, तो डेटा सेंटर्स का यह विस्तार भारत में विकास से ज्यादा बोझ बन सकता है।