ब्रिटेन की कानूनी फर्म स्टीवर्ट्स (Ahmedabad Plane Crash) ने एयर इंडिया पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि एयरलाइन अहमदाबाद प्लेन क्रैश में मारे गए या घायल यात्रियों के परिजनों को मुआवजा देने से बचने की कोशिश कर रही है। फर्म के मुताबिक, एयर इंडिया ने मुआवजा प्रक्रिया के दौरान जानबूझकर ऐसे दस्तावेज और जानकारियां मांगी हैं, जिनसे पीड़ित परिवारों का मुआवजा घटाया जा सकता है।
स्टीवर्ट्स फर्म इस हादसे से प्रभावित 40 से अधिक परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रही है। फर्म के वकील पीटर नीनन ने कहा है कि एयर इंडिया ने मृतकों के परिवारों से उनकी आर्थिक स्थिति, सालाना आय, भविष्य की कमाई की संभावनाएं और पारिवारिक खर्च से जुड़ी संवेदनशील जानकारी मांगी। नीनन के अनुसार, यह जानकारी मुआवजे की राशि कम करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है।
स्टीवर्ट्स ने क्या लगाए आरोप
वकील नीनन ने कहा कि एअर इंडिया पीड़ित परिवारों के साथ अनैतिक और अपमानजनक व्यवहार कर रही है। एअर इंडिया इस तरह से व्यवहार कर लगभग 1,050 करोड़ रुपए बचाने की कोशिश कर सकती है। उन्होंने मामले की जांच की मांग भी की है। वहीं, उन्होंने अपने क्लाइंट्स को सलाह दी है कि वे फॉर्म न भरें और मुआवजा पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाएं।
पीड़ित परिवारों का आरोप
ब्रिटेन की कानून फर्म Stewarts के वकील पीटर नीनन ने बताया कि एयर इंडिया ने परिवारों को बिना पूर्व सूचना और कानूनी सलाह दिए संवेदनशील वित्तीय जानकारी भरने को कहा। यह काम भीड़भाड़, गर्मी और अंधेरे वाले कमरे में कराया गया। परिवारों से ऐसे दस्तावेज भरवाए गए जिनमें यह स्पष्ट नहीं था कि उनसे क्या जानना है। कई परिवारों को कहा गया कि जब तक वे फॉर्म नहीं भरते, उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। पीड़ितों को उन फॉर्म की कोई कॉपी तक नहीं दी गई और कानूनी सलाह लेने का समय भी नहीं मिला। कुछ मामलों में एयर इंडिया के अधिकारी सीधे घर पहुंचकर फॉर्म भरने का दबाव बनाने लगे।
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एक पीड़ित महिला ने बताया – “हमें गर्म और भीड़भाड़ वाले कॉरिडोर में ले जाकर बिना किसी निजता के सवाल पूछे गए। उन्होंने कहा कि अगर हमने फॉर्म नहीं भरा तो मुआवजा नहीं मिलेगा।”
मुआवजे में देरी और विवाद
स्टीवर्ट्स का आरोप है कि एयर इंडिया पीड़ितों को उनके अधिकारों से वंचित कर रही है। पीड़ितों को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून खासकर मॉन्ट्रियल कन्वेंशन 1999 के तहत मुआवजे के हकदार हैं। इस कन्वेंशन के तहत हवाई दुर्घटना में मारे गए या घायल यात्रियों को अधिकतम 1.4 लाख डॉलर (करीब 1.17 करोड़ रुपये) तक का मुआवजा मिल सकता है। लापरवाही सिद्ध होने पर यह राशि और बढ़ सकती है।
एयर इंडिया ने पूरे विवाद पर दी सफाई
एअर इंडिया ने इन सभी आरोपों को नकारते हुए कहा है कि ये दावे गलत और आधारहीन हैं। एयरलाइन ने मीडिया में दिए बयान में कहा कि फॉर्म का उद्देश्य केवल पारिवारिक संबंधों की पुष्टि करना है, ताकि मुआवजा सही व्यक्ति तक पहुंचे। हमने फॉर्म को जितना हो सके सरल बनाने की कोशिश की है ताकि मुआवजा सही व्यक्ति तक जल्दी और सही तरीके से पहुंचे।
एयरलाइन ने दावा किया कि पहले ही कुछ परिजनों को अंतरिम मुआवजा देना शुरू कर दिया है और वे सभी परिवारों की पूरी मदद कर रहे हैं। कुछ औपचारिक प्रक्रियाएं जरूरी हैं, लेकिन हम परिवारों को पूरा समय और सहूलियत दे रहे हैं।
क्या है पूरा मामला
12 जून 2025 को एयर इंडिया की फ्लाइट 171 दिल्ली से अहमदाबाद की ओर जा रही थी, जब लैंडिंग के दौरान विमान तकनीकी खराबी का शिकार हो गया। बताया जा रहा है कि विमान में लैंडिंग से ठीक पहले इंजन में गड़बड़ी आई, जिससे रनवे पर उतरते समय विमान फिसल गया और उसमें आग लग गई। हादसे के समय विमान में लगभग 120 यात्री सवार थे। इस दुर्घटना में 30 से अधिक यात्रियों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
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घटना के तुरंत बाद एयरपोर्ट अथॉरिटी, फायर ब्रिगेड और NDRF की टीमें राहत और बचाव कार्य में जुट गईं। गंभीर रूप से घायलों को अहमदाबाद के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया। इस हादसे के बाद देशभर में विमान सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। शुरुआती जांच में इंजन फेल्योर और ब्रेकिंग सिस्टम में तकनीकी खामी की आशंका जताई गई है, हालांकि DGCA की ओर से विस्तृत जांच अभी जारी है।
हादसे के बाद एयर इंडिया की ओर से मृतकों और घायलों के परिजनों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन इसी को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि एयर इंडिया ने मुआवजे से पहले संवेदनशील जानकारी मांगकर उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया और उनके अधिकारों को नजरअंदाज किया। ब्रिटेन की कानूनी फर्म Stewarts इस मामले में 40 से ज्यादा पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रही है और एयर इंडिया के रवैये को नैतिक रूप से निंदनीय बताया है। यह हादसा ना केवल तकनीकी चूक का गंभीर मामला है, बल्कि पीड़ितों के साथ व्यवहार को लेकर भी एक संवेदनशील कानूनी और नैतिक बहस का विषय बन गया है।
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