Hariyali Amavasya 2025: हरियाली अमावस्या पर बन रहे हैं ये 3 दुर्लभ संयोग, जानें क्या करें?

बता दें, हरियाली अमावस्या के दिन कई स्थानों पर मेले लगते हैं, विशेषकर राजस्थान के पुष्कर और उत्तर प्रदेश के वृंदावन, मथुरा, काशी जैसे तीर्थस्थलों में।

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भारत में हरियाली अमावस्या (Hariyali Amavasya 2025) केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने का प्रतीक है। सावन मास की अमावस्या तिथि को पड़ने वाला यह दिन न सिर्फ पूजा-पाठ के लिए शुभ होता है, बल्कि पर्यावरण और सामाजिक चेतना का भी परिचायक बन चुका है। वर्ष 2025 में हरियाली अमावस्या 24 जुलाई, बुधवार को मनाई जाएगी।

इस दिन को लेकर न केवल हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है, बल्कि लोकपरंपराओं, व्रत-कथाओं और सामाजिक आयोजनों में भी इसका विशेष स्थान है। विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में यह पर्व उत्सव की तरह मनाया जाता है।

हरियाली अमावस्या 2025: शुभ तिथि और योग

  • तिथि: 24 जुलाई 2025, बुधवार
  • अमावस्या प्रारंभ: 24 जुलाई, सुबह 03:50 बजे
  • अमावस्या समाप्त: 25 जुलाई, सुबह 05:15 बजे
  • शुभ पूजा मुहूर्त: सूर्योदय से सूर्यास्त तक
  • पितृ तर्पण मुहूर्त: दोपहर 11:45 से 01:30 तक (अभिजीत मुहूर्त)
  • विशेष योग: बुधवार और अश्लेषा नक्षत्र का योग, जो गृहस्थ सुख और मानसिक शांति के लिए शुभ माना जाता है।

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धार्मिक महत्व: शिव, प्रकृति और पितृ पूजन का योग
हरियाली अमावस्या सावन मास में आती है, जो स्वयं भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की विशेष पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन शिव को जल, बेलपत्र, दूध, धतूरा आदि अर्पित करने से विशेष पुण्य फल मिलता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

साथ ही, यह दिन पितरों के तर्पण के लिए भी विशेष माना जाता है। जिन लोगों ने श्राद्ध या पितृकार्य नहीं किया होता, वे इस दिन तिल-जल अर्पित कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि हरियाली अमावस्या के दिन किया गया पितृ तर्पण और दान कई गुना पुण्य प्रदान करता है।

धार्मिक दृष्टि से एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस दिन वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल, बरगद, आंवला, नीम और तुलसी जैसे पौधों में देवताओं का वास माना गया है। विशेषकर पीपल को विष्णु और तुलसी को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। इस दिन वृक्षों को जल देना, उनकी पूजा करना और नए पौधे लगाना एक धार्मिक अनुष्ठान बन चुका है।

बन रहे हैं ये दुर्लभ संयोग इस वर्ष हरियाली अमावस्या पर कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इसे और भी खास बना रहे हैं:

पुष्य नक्षत्र: हरियाली अमावस्या का दिन पुष्य नक्षत्र में पड़ रहा है, जिसे सभी नक्षत्रों में राजा माना जाता है। पुष्य नक्षत्र में किए गए सभी कार्य, विशेष रूप से धार्मिक और मांगलिक, अत्यंत शुभ फलदायी होते हैं।

सर्वार्थ सिद्धि योग: इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है, जो सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना जाता है। इस योग में किए गए कार्यों में सफलता निश्चित होती है।

धृति योग: धृति योग भी इस दिन के शुभता में वृद्धि कर रहा है। यह योग स्थिरता और दृढ़ता प्रदान करने वाला होता है।

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पूजा-विधि: कैसे करें पूजा और व्रत

  • सवेरा स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान शिव की पूजा करें: बेलपत्र, गंगाजल, दूध, शहद, धतूरा आदि अर्पित करें और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें।
  • देवी पार्वती की पूजा: सुहाग सामग्री अर्पित करें और सौभाग्य की कामना करें।
  • पीपल और तुलसी वृक्ष की पूजा करें: दीप जलाएं, जल अर्पित करें और परिक्रमा करें।
  • पितृ तर्पण करें: पूर्वजों के नाम से तिल-जल और पिंडदान करें।
  • वृक्षारोपण करें: धार्मिक मान्यता है कि इस दिन लगाया गया पौधा जीवनभर पुण्य फल देता है।

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बता दें, हरियाली अमावस्या के दिन कई स्थानों पर मेले लगते हैं, विशेषकर राजस्थान के पुष्कर और उत्तर प्रदेश के वृंदावन, मथुरा, काशी जैसे तीर्थस्थलों में। महिलाएं इस दिन झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और सुहाग का आशीर्वाद मांगती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे ‘श्रावणी अमावस्या’ भी कहा जाता है।

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