वंदे मातरम की असली कहानी: जानिए कैसे बंकिमचंद्र ने ब्रिटिश अहंकार को दी चुनौती

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि आज़ादी की पुकार और एकता का प्रतीक रहा है। 1870 के दशक में नौकरशाह और उपन्यासकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय (Vande Mataram) ने इसे लिखा, और यह ब्रिटिश अहंकार के खिलाफ एक सोचा-समझा जवाब था। इसके पीछे एक घटना छिपी है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीयों के भीतर गुस्से की आग और तेज कर दी।

उस दौर में ब्रिटिश शासन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मज़बूती से स्थापित हो चुका था, लेकिन बंगाल, जहां बंकिमचंद्र का जन्म हुआ, राजनीतिक और सांस्कृतिक हलचल का केंद्र था। बंगाल प्रेसीडेंसी में आज का पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर-पूर्व और बांग्लादेश शामिल थे।

एक अपमान जिसने बदल दी दिशा
1873 में, जब बंकिमचंद्र मुर्शिदाबाद जिले के डिप्टी कलेक्टर थे, बेहरामपुर में उनके साथ एक अपमानजनक घटना हुई। वे काम के बाद पालकी में लौट रहे थे, तभी ब्रिटिश अफसर कर्नल डफिन के क्रिकेट खेल में बाधा पड़ गई। गुस्से में डफिन ने बंकिमचंद्र को पालकी से घसीटकर बाहर निकाला और सबके सामने मारा। यह घटना उस दौर के नस्लीय भेदभाव और ब्रिटिश घमंड की साफ तस्वीर थी।

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बंकिमचंद्र ने कानूनी लड़ाई लड़ी और अदालत ने कर्नल डफिन को खुलेआम माफी मांगने का आदेश दिया। यह किसी भारतीय अधिकारी के लिए दुर्लभ जीत थी और लोगों ने इसे गर्व के साथ देखा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यही घटना वंदे मातरम लिखने की असली चिंगारी बनी।

गीत में उपजी मां की छवि
इस अपमान के बाद, बंकिमचंद्र कुछ समय के लिए लालगोला पैलेस में रुके, जहां उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक चिंतन में समय बिताया। देवी काली की छवि जो त्याग, बलिदान और शक्ति का प्रतीक है उनके मन में भारत मां की पीड़ा और ताकत का प्रतीक बन गई। इसी भाव ने वंदे मातरम को जन्म दिया। यह गीत 1875 में बंगदर्शन पत्रिका में पहली बार छपा। संस्कृत में रचित और बंगाली लिपि में लिखे इस गीत ने जल्दी ही लोकप्रियता हासिल कर ली।

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स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम की गूंज
कांग्रेस के गठन से पहले ही वंदे मातरम लोगों के दिलों में घर कर चुका था। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया और धुन भी बनाई। 1905 में बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में यह गीत एकजुटता का प्रतीक बन गया।

बाद में मुस्लिम लीग ने इसके कुछ हिस्सों में देवी दुर्गा के संदर्भ पर आपत्ति जताई, इसे धार्मिक गीत मानते हुए राष्ट्रीय गीत के रूप में विरोध किया। 1937 में कांग्रेस ने समझौते के तहत इसके केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया।

1950 में संविधान सभा के अंतिम सत्र में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का सम्मान दिया, जिसे राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर माना गया। हालांकि, संविधान में राष्ट्रगान के सम्मान का जिक्र है, लेकिन राष्ट्रगीत के सम्मान का कोई स्पष्ट्र प्रवाधान नहीं है। वंदे मातरम आज भी भारत की आज़ादी की लड़ाई, सांस्कृतिक विरासत और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बंकिमचंद्र की अडिग चुनौती का अमर प्रतीक है।

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