लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर…‘Vote Chori’ के आरोपों पर अखिलेश यादव घिरे, DM ने दिया जवाब

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘वोट चोरी’ का मुद्दा गरमाया हुआ है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने दावा किया कि राज्य के कई जिलों में मतदाता सूची से लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि यह सब एक साज़िश के तहत किया जा रहा है। लेकिन जब चुनाव आयोग और जिलाधिकारियों ने इन दावों की पड़ताल की, तो तस्वीर बिल्कुल अलग सामने आई।

अखिलेश यादव का आरोप
अखिलेश यादव ने 17 अगस्त 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर लिखा कि लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी और जौनपुर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। उन्होंने इसे वोट चोरी की साज़िश बताते हुए चुनाव आयोग को सबूत सौंपने की बात भी कही। साथ ही, उन्होंने कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं और सवाल उठाया कि अगर आयोग की दी हुई डिजिटल रसीद गलत साबित होती है तो ‘डिजिटल इंडिया’ पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे।

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जिलों से क्या निकला सच? लेकिन अखिलेश के इन आरोपों पर जब ज़िलेवार जांच हुई तो हकीकत कुछ और ही मिली

  • लखनऊ (बक्शी का तालाब क्षेत्र): अखिलेश ने कहा कि 13 लोगों के नाम हटाए गए हैं। जांच में सामने आया कि इनमें से सिर्फ़ एक नाम 2012 में हटाया गया था, क्योंकि वह व्यक्ति उस क्षेत्र में रहता ही नहीं था। बाकी सभी 12 नाम आज भी वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।

  • कासगंज (अमांपुर क्षेत्र): यहाँ उन्होंने 8 नाम हटाए जाने का दावा किया। DM की जांच में पता चला कि 7 नाम वोटर लिस्ट में दो बार दर्ज थे, जिनमें से डुप्लीकेट एंट्री हटाई गई। आठवाँ नाम अभी भी सूची में मौजूद है।

 

  • बाराबंकी (कुर्सी क्षेत्र): अखिलेश ने कहा कि दो मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया। लेकिन DM की जांच में पाया गया कि दोनों नाम वोटर लिस्ट में दर्ज हैं, किसी को हटाया नहीं गया।

  • जौनपुर: यहाँ आरोप था कि 5 लोगों के नाम हटा दिए गए। जांच में सामने आया कि ये सभी मतदाता 2022 से पहले ही निधन हो चुका था। स्थानीय परिवार और लोगों ने भी इसकी पुष्टि की थी। नियम के तहत मृत मतदाताओं के नाम हटाना ज़रूरी है।

आयोग का जवाब
चुनाव आयोग और जिलाधिकारियों ने साफ़ कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के तहत होती है। दोहराए गए नाम या मृत लोगों के नाम हटाना चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसे में अखिलेश यादव के आरोप न केवल तथ्यहीन हैं, बल्कि इससे संवैधानिक संस्थाओं पर बेवजह सवाल खड़े होते हैं और जनता भी गुमराह होती है।

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