जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह 96 करोड़ी मुखी बुढ़ा दल ने की शिरकत, हजारों संगत ने बढ़ाई मेले की रौनक
हनुमानगढ़। नगर के ऐतिहासिक गुरूद्वारा शहीद बाबा सुखा सिंह-बाबा महताब सिंह छावनी बुढ़ा दल में मंगलवार 9 सितम्बर 2025 (25 भादो) को सालाना शहीदी जोड़ मेला बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया गया। यह मेला संगतों के सहयोग से पंथ रतन सिंह साहब जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह जी 96 करोड़ी मुखी बुढ़ा दल की अगुवाई में आयोजित हुआ। 18वीं सदी के महान शहीदों की याद में आयोजित यह मेला न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि युवाओं को पंथ और समाज की सेवा के लिए प्रेरित करता है।
अखंड पाठ और खुले दीवान से हुई शुरुआत
सुबह 10 बजे लड़ीवार अखंड पाठ साहिब के भोग डाले गए। इसके बाद फोर्ट स्कूल ग्राउंड में खुले दीवान सजाए गए, जिसमें हजारों की संख्या में संगत शामिल हुई। भारी भीड़ के कारण नगर में यातायात व्यवस्था बिगड़ गई और लंबी-लंबी कतारों में वाहन फंसे रहे। पुलिस प्रशासन और सेवादारों ने मिलकर यातायात व्यवस्था को संभाला।
शहीदी इतिहास से जुड़ी यादें
गुरूद्वारा के सेवादार बाबा जोगा सिंह और बाबा जग्गा सिंह ने बताया कि वर्ष 1739 में अफगान शासक नादिरशाह की सेना ने अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। उस समय लाहौर के जनरल जकरीया खां ने ‘मस्सेरंगड़’ को श्री हरमंदर साहिब का मुखी नियुक्त किया, जिसने दरबार साहिब को अय्याशी का अड्डा बना दिया। जब यह बात बुढ़ा दल के चौथे मुखी और श्री अकाल तख्त के जत्थेदार बाबा जस्सा सिंह अहलुवालिया को पता चली तो उन्होंने हनुमानगढ़ की धरती से शहीद बाबा सुखा सिंह और शहीद बाबा महताब सिंह को मस्सेरंगड़ को सबक सिखाने अमृतसर भेजा। दोनों वीरों ने मस्सेरंगड़ का वध कर उसका सिर बरछे पर टांगा और वापसी में हनुमानगढ़ में विश्राम किया। उनकी उसी शहादत और बलिदान की स्मृति में हर वर्ष यह शहीदी मेला मनाया जाता है।
संत महापुरुषों के प्रवचन
मेले में आयोजित धार्मिक दीवानों में बाबा मनमोहन सिंह जी बारनवाले, बाबा जोगा सिंह करनाल वाले, बाबा मोर सिंह, बाबा नादर सिंह होशियारपुर, भााई सुखजीत सिंह कन्हैया,भाई हरजीत सिंह इगलैण्ड यू.के. श्री हरमंदिर साहिब से पहुंचे रागी जत्थे भाई शुभदीप सिंह, कथा वाचक लखविंदर सिंह पारस टाढ़ी जत्था और लखबीर सिंह कोटकपूरा ने कथा-कीर्तन द्वारा संगत को निहाल किया। जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह जी ने गुरू इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सिख इतिहास बलिदान, त्याग और धर्मनिष्ठा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि गुरू नानक देव जी ने सत्य, नाम सिमरन और सेवा का मार्ग दिखाया। उनके बाद आए सभी गुरुओं ने मानवता, न्याय और समानता के लिए कार्य किया। गुरु अर्जुन देव जी ने सत्य की राह में शहादत स्वीकार की, वहीं गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मीरी-पीरी का संदेश दिया। गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश बलिदान कर दिया। अंत में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की और “चढ़दी कला” का संदेश दिया। उन्होने कहा कि सिख गुरुओं की यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने निस्वार्थ सेवा, भाईचारे और इंसाफ का मार्ग प्रशस्त किया। शहीद बाबा सुखा सिंह और बाबा महताब सिंह जैसे वीरों ने भी इस परंपरा को जीवित रखते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। जत्थेदार जी ने संगत को संदेश दिया कि हमें अपने गुरुओं के उपदेशों और शहादतों से प्रेरणा लेकर जीवन में सच्चाई, सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए। यही सच्चा श्रद्धांजलि और गुरुओं के इतिहास का सम्मान है। बाबा मनमोहन सिंह बारनवाले ने अपने प्रवचन में संगत को नशा त्यागने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि नशा मनुष्य की सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक प्रवृत्ति को नष्ट करता है। युवाओं को खेलों से जुड़कर स्वस्थ जीवन जीने और समाज को प्रेरित करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने संगत को पर्यावरण संरक्षण के लिए एक-एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने की अपील की।
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