जिम्मेदारी के बोझ से दबा बचपन

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आगे बढ़ने की इस हौड़ में कितना कुछ तबाह हो गया
ज़िम्मेदारी के बोझ में, फिर एक बचपन बर्बाद गया
कहाँ खेला कूदा होगा वो, कहाँ ज़िद की होगी
कहाँ पैरो को पटका होगा, कहा मिट्टी में सना होगा
कुछ कर दिखाने की चाह में कितना कुछ तबाह हो गया
जिम्मेदारी के बोझ में, फिर एक बचपन बर्बाद हो गया
कहाँ हाथो में खिलौने पकड़े होंगे,कहाँ किताबें थमाई होंगी
कहाँ वो पेंसिल से अक्षर बनाये होंगे, कहाँ पैन की स्याही रंगी होगी
दो वक़्त की रोटी के चक्कर मे सब कुछ तबाह हो गया
जिम्मेदारी के बोझ में, फिर एक बचपन बर्बाद हो गया
कहाँ देर तक वो सो सका होगा, क्या रातों को नींद भी आई होगी
कोई नही ज़िद पूरी करने वाला, क्या कभी कोई फरमहिश भी की होगी
थोड़ी सी कमाई के चक्कर मे सारा दिन वो भटका होगा
नन्ही सी उम्र में कितना वो समझदार हो गया
जिम्मेदारी के बोझ में, फिर एक बचपन बर्बाद हो गया ।