लोकतंत्र का विश्वास आस्था में तब्दील होता जा रहा है और हो भी गया है

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हमारे यहां विश्‍व के सभी प्रमुख धर्म हैं, बीस राज भाषाएं तथा 780 बोलियां हैं। मतदाताओं की संख्‍या आकार की दृष्‍टि से,  किसी भी महाद्वीप के कुल मतदाताओं की संख्‍या से अधिक है। भारत में मई, 2014 में सम्‍पन्‍न हुआ 14वां आम चुनाव विश्‍व इतिहास में सबसे बड़ा चुनाव था। 534 मिलियन मतदाताओं ने 1.8 मिलियन ईवीएम के माध्‍यम से 9,31,986 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। वर्ष 2009 में हुए आम चुनाव की तुलना
में 2014 के आम चुनावों में 118 मिलियन से अधिक मतदाताओं की वृद्धि हुई है। आज हम स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव से लेकर अब तक के चुनावी इतिहास पर सरसरी तौर पर नजर डालते हैं तो कई आश्चर्यचकित कर देने वाली घटनाएं सामने आती हैं जिन पर सहसा यकीन ही नहीं होता। देखा जाए तो भारत में चुनाव की प्रक्रिया आजादी के पहले ही शुरू हो चुकी थी। तब इसका राजनैतिक दायरा ब्रिटिश हिन्दुस्तान के 11 प्रान्तों तक ही सिमटा हुआ था। रियासतों की जनता को तब तक चुनाव प्रक्रिया के बारे में कुछ विशेष जानकारी ही नहीं थी। स्वतंत्र भारत में सबसे पहला वोट 25
अक्टूबर 1951 को हिमाचल की छिनी तहसील में पड़ा था।  फरवरी 1952 में चुनाव खत्म हुए। थके हारे तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने इसे लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रयोग कहा था। चुनावी दंगल का दायरा एक लाख वर्ग
मील में फैला हुआ था। तब देश की कुल 36 करोड़ आबादी में से लगभग साढ़े 17 करोड़ लोग बालिग थे। लगभग 4500 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इसमें लोकसभा की 489 सीटें थीं और अन्य राज्य विधानसभाओं की। कांग्रेस संसद की 489 में से 364 सीटें जीतने में कामयाब रही। इसका सबसे बड़ा कारण थे जवाहरलाल नेहरू। उधर, राज्यों की विधानसभाओं में भी उसका प्रदर्शन शानदार रहा। कुल 3280 सीटों में से कांग्रेस ने 2,247 पर जीत हासिल की। तुर्की के एक पत्रकार ने  इसे 17 करोड़ लोगों की जीत बताया था।

ठेठ भारतीय प्रणाली
यह चुनाव दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग था। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी ने मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक ढंग से अपनी सरकार चुनी थी। हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहला आम चुनाव दरअसल ‘वन-पार्टी सिस्टम’ का पहला पड़ाव था। इसके साथ ही भारत ने एक ठेठ भारतीय प्रणाली की भी शुरूआत की। गरीब और निरक्षर जनता अपने वोट का इस्तेमाल कैसे कर सके, इसके लिए अनोखा इंतजाम हुआ। चुनाव चिन्ह का आवंटन किया गया ताकि जो लोग प्रत्याशी का नाम नहीं पढ़ सकें, वे चित्र देखकर पहचान कर लें। दो बैलों की जोड़ी, हंसिया-बाली और चिराग जैसे चुनाव चिन्ह रखे गए। लोगों में उत्साह दिखा। मेले जैसा माहौल रहा। मतदान के दिन लोगों ने नहा-धोकर अच्छे कपड़े पहने। पहले आम चुनावों में 40 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। यह उल्लेखनीय उपलब्धि थी। कांग्रेस को कुल 45 प्रतिशत वोट मिले। विपक्ष को 55 प्रतिशत वोट
मिले। वह बिखरा हुआ था और इसीलिए सिर्फ 125 सीटें ही जीत सका। 17 अप्रेल 1952 को गठित हुई इस लोकसभा ने 4 अप्रेल, 1957 तक का अपना कार्यकाल पूरा किया।

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भारत के गणतंत्र बनने के एक दिन पहले चुनाव आयोग का गठन सबके सामने पहला एक यक्ष प्रश्न था कि भारत लोकतंत्र कब बनेगा? भारत के गणतंत्र बनने के एक दिन पहले चुनाव आयोग का गठन किया गया।  सुकुमार सेन
को पहला मुख्य चुनाव आयुक्त किया गया। ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि पहला आम चुनाव, बाकी बातों के अलावा जनता का विश्वास हासिल करने की भी जंग था। यह बात सही है। यूरोप और अमरीका में जहां वयस्क मताधिकार के सीमित मायने थे। वहां महिलाओं को पहले-पहल इस अधिकार से वंचित रखा गया था, वहीं इसके उलट नए-नए आजाद हुए हिन्दुस्तान ने देश के सभी वयस्क लोगों को मताधिकार सौंप दिया था। तब अशिक्षित महिलाएं अपना नाम ‘फलां की मां’ या ‘फलां की पत्नी’ ही बताती थीं। जिस देश में सदियों से राजशाही रही हो, जहां शिक्षा का स्तर महज 20 फीसदी हो, उस देश की आबादी को अपना शासन चुनने का अधिकार मिलना उस देश के लिए ही नहीं, शायद पूरे विश्व के लिए उस साल की सबसे बड़ी घटना थी।

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अलग राजनीतिक दल
स्वतंत्र भारत में चुनाव होने से पहले जवाहरलाल नेहरू के दो पूर्व कैबिनेट सहयोगियों ने कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अलग राजनीतिक दलों की स्थापना की।  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की तो  बी. आर. अम्बेडकर ने ‘अनुसूचित जाति महासंघ’ को पुनर्जीवित किया। अब तो भारत में राजनीतिक दलों की संख्या देश की जीडीपी की गति से भी आगे बढ़ रही है। भारत चुनाव आयोग में पिछले डेढ़ महीने में 22 ज्यादा राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन किया गया है। इनमें सबसे ज्यादा पांच राजनीतिक दल राजस्थान से रजिस्टर्ड करवाए गए हैं। दूसरे नंबर पर यूपी है, जहां से चार राजनीतिक दलों को मान्यता मिली है। भारत निर्वाचन आयोग ने पिछले 20 जून से 3 अगस्त तक करीब 44 दिन में 22 नई पार्टियों का रजिस्ट्रेशन कर उनकी सूची सार्वजनिक की है। इसमें
राजस्थान की पंच पार्टी और अभिनव राजस्थान पार्टी का नाम शामिल है। आयोग की ओर से जारी सूची में उन तीन पार्टियों भारत वाहिनी पार्टी, सर्व शक्ति दल और भारतीय जन सत्ता दल का नाम भी शामिल हैं, जिन्हें इसी अवधि में
रजिस्ट्रेशन मिला है। आयोग की सूची के अनुसार सबसे अधिक राजस्थान से पांच, उत्तर प्रदेश से चार, तमिलनाडु एवं नई दिल्ली से तीन-तीन और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक, मिजोरम, बिहार एवं महाराष्ट्र से एक-एक पार्टी का रजिस्ट्रेशन हुआ है। कई और राजनीतिक दलों ने रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया हुआ है।  इन 22 पार्टियों को मिलाकर देश में 2091 राजनीतिक दलों का पंजीयन हो चुका है।

लोकतंत्र का विश्वास आस्था में तब्दील

5 माह का समय लगा था (अक्तूबर 1951-फरवरी 1952)
4,500 सीटों के लिए हुए थे चुनाव (लोकसभा एवं विधान सभाओं का एक साथ)
18,000 प्रत्याशियों ने आजमाई थी अपनी किस्मत।
17.6 करोड़ मतदाताओं का हुआ था पंजीकरण।
3.8 लाख पेपर रिम्स का उपयोग बैलेट पेपर बनाने के लिए किया गया।
3.90 लाख स्याही के पैक का उपयोग उंगलियों पर निशान लगाने के लिए।
20 लाख बैलेट बाक्स बनवाए गए।
8,200 टन स्टील लगा बैलेट बॉक्स बनाने में।
2.24 लाख मतदान केंद्र बनाए गए
16,500 लोगों को 6 महीने के अनुबंध पर मतदान कराने के लिए नियुक्त किया गया।
56,000 अधिकारियों को निगरानी के लिए चुना गया
2.8 लाख वालंटियर भी दे रहे थे सहयोग
24 लाख पुलिसकर्मियों को लगाया गया था चुनाव कार्यों में।
13,000 फिल्म चुनाव संबंधी जानकारी देने के लिए  दिखाई गईं।

इसके बाद तो लोगों का लोकतंत्र में यह विश्वास धीरे-धीरे आस्था में तब्दील होता जा रहा है और हो भी गया है।

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