तारों की याद

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प्रमुदित तारों की जागृति,
ताक रजनी की पहरेदारी,
क्षोभ से छनकर चमककर,
अनंत को आँखों से मिलाती।

मायावी चमक पसारे तारे,
चाँद की अराधना को जगते,
व्याकुल मन ढुंढते हैं इनके,
“अमावस को कहाँ हैं, प्रभु हमारे।”

आँगन की यह तस्वीर थी,
हमारे गाँव के रातों की।
देख मोहित भए, शर्वरी सिमट जाती,
रैना की यह बात आज भी याद आती।

नगरों में आशाएँ हैं, जीविका है,
शिक्षा है, सुविधा है।
छः दीवारी, बंद राते हैं,
विकास के छल सारे हैं।

छत से भी नभ दर्शन एक घटना है,
तारों और हमारे बीच, प्रदुषण अति घना है।
बहुमंजिली इमारतें चाँद भी छुपा देती है,
और रात बस वीरान कट जाती है।

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