हिंदू धर्म में कई तीज-त्योहार होते हैं,मगर उनमें से कुछ व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं और महीने में 2 बार आते हैं। प्रदोष का व्रत भी उन्हीं में से एक है। 5 अगस्त 2025, दिन शुक्रवार को शुक्र प्रदोष व्रत (Shukra Pradosh Vrat 2025) रखा जा रहा है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है।
ऐसी मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से देवों के देव महादेव की खास कृपा मिलती है। इसके साथ ही सभी दुखों से मुक्ति मिलती है।
शुक्र प्रदोष व्रत शुभ समय (Shukra Pradosh)
- तिथि – 5 सितंबर 2025
- समय- प्रदोष सुबह 4:08 बजे से प्रारंभ होकर 6 सितंबर 2025, सुबह 3:12 बजे तक रहेगा।
- पूजा का श्रेष्ठ समय – शाम 6:38 बजे से लेकर रात 8:55 बजे तक पूजा करने का सर्वोत्तम समय रहेगा।
- महत्व- भद्रपद माह में शुक्रवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत आपको दांपत्य सुख के साथ-साथ भौतिक संपत्ति और सौभाग्य देकर जाता है।
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शुक्र प्रदोष पूजा विधि
- व्रत वाले दिन आपको स्नान जरूर करना चाहिए। अगर आपके पास नए और साफ वस्त्र हों तो आपको व्रत वाले दिन पहन लेना चाहिए।
- अब शिव पार्वती की प्रतिमा पर गंगाजल, दूध, दही, शहद, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत आदि से अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद धूप दीप आदि दिखाकर मंत्र जाप करना चाहिए।
- आप आज के दिन 108 बार शिव जी का जाप “ॐ नमः शिवाय” कर सकती हैं। हो सके तो आपको आज शिव जी को प्रसन्न करने के लिए रुद्राष्टक का पाठ करना चाहिए।
- आज आप किसी भी सफेद वस्तु का दान जरूर करें। इसमें आप खाने-पीन औरपहनने की चीजों का दान कर सकती हैं।
- आज के दिन आपफलाहार और निर्जला कैसा भी व्रत रख सकती हैं। इस बात काध्यान रखें कि अपना उपवास आपको प्रदोष काल में ही खोलना है।
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शुक्र प्रदोष व्रत कथा
अंबापुर गांव में एक ब्राह्मण महिला रहती थी, जिसके पति का निधन हो चुका था। वह भिक्षा मांगकर गुजारा करती थी। एक दिन उसे दो छोटे बच्चे मिले, जिन्हें वह अपने साथ घर ले आई। कुछ समय बाद, वह उन बच्चों को लेकर ऋषि शांडिल्य के पास गई और उनके माता-पिता के बारे में पूछा। ऋषि ने बताया कि ये बच्चे विदर्भ नरेश के राजकुमार हैं, जिनका राज्य गंदर्भ नरेश ने छीन लिया है। यह सुनकर महिला ने उनसे राजपाट वापस पाने का उपाय पूछा। तब ऋषि शांडिल्य ने उन्हें प्रदोष व्रत करने की सलाह दी।

महिला और दोनों राजकुमारों ने श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत किया। इसके प्रभाव से बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई और दोनों विवाह के लिए तैयार हो गए। अंशुमती के पिता ने राजकुमारों की मदद की और वे गंदर्भ नरेश को युद्ध में हराकर अपना राज्य वापस ले लिया। राजकुमारों ने उस ब्राह्मणी को दरबार में एक विशेष स्थान दिया, जिससे वह भी सुख से रहने लगी और भगवान भोलेनाथ की बड़ी भक्त बन गई।




































