छठ पूजा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र पर्व है, जिसे विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के लोग बड़े ही मनाते हैं। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित होता है। इस दौरान महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि के लिए व्रत-उपवास करती हैं और सूर्य देव की उपासना करने के साथ उन्हें अर्घ्य देती हैं। आपको बताते हैं छठ पूजा (chhath puja katha) की संपूर्ण व्रत कथा के बारे में, जिसका पाठ करके आप इस व्रत को सफल बना सकती हैं।
छठ पूजा की पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करने के लिए खुद को दो भागों में बांटा जिसमें दाएं भाग में पुरुष और बाएं भाग में प्रकृति का रूप सामने आया। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक अंश को देव सेना कहा जाता है क्योंकि प्रकृति का छठा अंश होने की वजह से देवी का एक नाम षष्ठी भी है जिन्हें छठी मैया के नाम से भी जाना जाता है। छठ पूजा की कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था वह सूर्य भगवान का परम भक्त था। नियमित स्नान करने के बाद सूर्यदेव की पूजा करता और कहानी कहता था, लेकिन ब्राह्मण कोई भी काम नहीं करता था जिसकी वजह से उसकी कमाई का कोई स्रोत नहीं था। ब्राह्मण घर में रहता तो ब्राह्मणी बार-बार धन कमाने के लिए उसको प्रेरित करती और जब कहीं बाहर जाता तो पड़ोसी उसे निकम्मा कहकर चिढ़ाया करते थे।
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सबके ताने सुन-सुनकर ब्राह्मण परेशान हो गया और एक दिन वह सुबह-सुबह नहा धोकर अपने पूजन की सामग्री लेकर जंगल में चला गया और वहां पर एक सूखे पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा-पाठ करने लगा। पूजा करने के बाद ब्राह्मण ने सूर्य भगवान की कथा कही और पीपल के वृक्ष के पास मौजूद एक तालाब से जल लेकर सूर्य देव को अर्पित किया। ब्राहण ने जैसे ही सूर्य देव को जल दिया वह जल बहकर पीपल के पेड़ तक पहुंच गया और सूखा पीपल हरा-भरा हो गया। फिर सूर्य देव साक्षात प्रकट हुए और ब्राह्मण से कहने लगे कि ब्राह्मण मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूं तुम्हें जो भी वरदान मांगना है मांग लो। ब्राह्मण ने आवाज सुनी तो वह पीपल में भूत होने के डर से भयभीत हो गया। नियमित रूप से जब भी ब्राह्मण सूर्यदेव को जल देता उसे वही आवाज सुनाई देती थी। इसी चिंता में ब्राह्मण बहुत कमजोर हो गया। जब कई दिनों तक ब्राह्मण घर नहीं पंहुचा तब ब्राह्मणी उसे खोजते हुए जंगल में पहुंच गई और ब्राह्मण की यह अवस्था देखकर वह भी चिंता में आ गई। तब ब्राह्मण ने उसे अपनी चिंता का कारण बताया कि रोज सूर्य देव को जल देने के बाद एक आवाज सुनाई देती है।
ब्राह्मण की सारी बात सुनकर ब्राह्मणी ने कहा कि जब आपके जल चढ़ाने के बाद में यह आवाज आती है तो मुझे तो लगता है कि सूर्य भगवान स्वयं आते हैं। कल भी अगर आपको वही आवाज सुनाई दे तो सब कुछ मांग लेना तो ब्राह्मण ने कहा कि कैसे मांगू मुझे तो कुछ मांगना ही नहीं आता है। ज्यादा कुछ कहना होगा तो मैं तो भूल जाऊंगा तुम मुझे कोई ऐसी तरकीब बताओ जिससे कम शब्दों में ज्यादा मिल जाए।
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ऐसे ने ब्राह्मणी कहने लगी कि तुम इस प्रकार से कहना कि नौ खंडे के महल के अंदर सोने के पालने में पड़ पोते पोतियो को दास दसियों द्वारा खेलते खिलाते हुए अपनी आंखों से देखूं इस प्रकार लंबी उम्र महल बेटे पड़ पोते बहुएं धन सब कुछ मिल जाएगा ब्राह्मण सु कर कहने लगा कि मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया तो ब्राह्मणी कहने लगी कि धन होगा तभी तो सोने का पालना दास दासियां होंगे आंखें घुटने ठीक होंगे तो ही अपनी पलकों से पोते पतियों को सोने के पाले में झूला झुला सकेंगे और देख सकेंगे बेटे और बहू होंगे तो ही पट पोते के दर्शन होंगे तो यह सुनकर ब्राह्मण ने कहा हां ठीक है अब मुझे सब कुछ समझ में आ गया।
दूसरे दिन जैसे ही ब्राह्मण ने स्नान करके पूजा पाठ करके सूर्य देवता को अर्घ्य दिया तो वही आवाज आई। ब्राह्मण ने वैसा ही कहा जैसा ब्राह्मणी ने समझाया था। तब सूर्य भगवान ने कहा कि देखने में तो भोला भाला लगता है एक बार में सब कुछ मांग लिया तुमने जो मांगा है वह तुम्हें अवश्य मिलेगा। ब्राह्मण की झोपड़ी महल में बदल गई और उसे थोड़े ही समय में सारी प्रजा राजा की जगह गुणगान करने लगी। जब यह बात राजा तक पहुंची तो राजा ने सुनकर उस ब्राह्मण को बुलाया और पूछा कि अचानक इतना धन कहां से आया।

ब्राह्मण ने कहा कि मैंने ना तो चोरी की है और ना ही डाका डाला है यह तो सब सूर्य भगवान की कृपा से मुझे प्राप्त हुआ है। यह कहकर ब्राह्मण ने सारी बात राजा को बता दी तो राजा ने कहा कि ब्राह्मण देवता मेरे पुत्र नहीं है अब तुम मुझे बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए, तो ब्राह्मण ने राजा को सूर्य भगवान की पूजा विधि बताई तो राजा ने वैसा ही किया। राजा के घर दसवें महीने सुंदर पुत्र ने जन्म लिया। उसी समय से लोग सूर्य भगवान की जय जयकार करने लगे। हे सूर्यदेव जैसे आपने ब्राह्मण और राजा की मनोकामना पूर्ण की वैसी सब की करें। बोलो छठी मैया की जय !
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