27 अगस्त से 10 दिनों तक गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का पावन पर्व मनाया जाएगा। इसका समापन अनंत चतुर्दशी यानी 06 सितंबर (शनिवार) को होगा। यह पर्व विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता भगवान गणेश को समर्पित होता है, उन्हें बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता भी माना जाता है।
खास बात ये है कि इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग भी रहेगा। चंद्र देव कन्या राशि में तो सूर्य देव अपनी प्रिय राशि सिंह में विराजमान रहेंगे। चतुर्थी तिथि दोपहर 03:44 बजे तक रहेगी इसके बाद पंचमी लग जाएगी। गणेश चतुर्थी पूजा का मुहूर्त 11:05 से 01:40 तक रहेगा।
गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi )पूजा साम्रगी
- सिंदूर, फूल और नारियल रखने के लिए कलश, कपूर, हल्दी, जनेऊ, हरे या पीले वस्त्र, चंदन, अक्षत आदि।
- एक चौकी मूर्ति स्थापना के लिए। ध्यान रहे चौकी पर किसी प्रकार का कोई धब्बा न हो।
- इसके अलावा, चौकी कहीं से भी टूटी या चटकी हुई न हो। चौकी पर बिछाने के लिए कपड़ा।
- बिछाने वाला कपड़ा लाल या पीला रंग का हो, किसी अन्य रंग का कपड़ा भूल से भी प्रयोग न करें।
- श्री गणेश की नई प्रतिमा लेकर आएं। इसके अलावा सुपारी, पान के पत्ते और मोदक भी लाएं।
- गणेश जी को अर्पित करने के लिए दूर्वा घास लेकर आएं। दूर्वा की माला बनाकर अर्पित करें।
- इसके अलावा, सजावट के रूप में भी दूर्वा घास का प्रयोग किया जा सकता है।
- घी, पीतल या मिट्टी का दीपक, अगरबत्ती या फिर उसके बदले धूपबत्ती भी ला सकते हैं।
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गणेश चतुर्थी व्रत कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Katha)
जो लोग गणेश चतुर्थी की पूजा करते हैं और घर गणपति की स्थापना करते हैं उन्हें गणेश चतुर्थी की व्रत कथा जरूर पढ़नी चाहिए। गणेश चतुर्थी की व्रत कथा के अनुसार भगवान गणेश का जन्म माता पार्वती के शरीर से निकले मैल से हुआ है। ऐसी मान्यता है कि एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं और स्न्नान से पहले उन्होंने अपने पूरे शरीर में उबटन लगाया और उस उबटन से एक पुतले का निर्माण किया जिसे उन्होंने विनायक नाम दिया। माता पार्वती ने विनायक को मुख्य द्वार पर पहरेदार बनाकर खड़ा कर दिया और उन्हें आदेश दिया कि वो स्नान करने जा रही हैं और किसी को भी भीतर आने की अनुमति न दें। उसी समय भगवान शिव माता पार्वती से मिलने आए और विनायक ने उन्हें भी भीतर जाने से मन कर दिया।

ऐसे में शिव जी ने क्रोध में आकर विनायक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती को इस बात का एहसास हुआ तब उन्होंने शिव जी से विनायक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा। उस समय शिव जी ने हाथी का मस्तक विनायक के सिर के स्थान पर लगा दिया और तभी से विनायक का नाम गणपति रख दिया गया। गणपति को प्रथम पूजनीय का स्थान प्राप्त हुआ। ऐसा कहा जाता है कि जिस दिन विनायक का गणपति के रूप में जन्म हुआ उसी दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा।
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