बुजुर्गों के प्रति निष्ठुर आधुनिक भारत

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जिस भारत को अपनेपन की भावना के लिए पहचाना जाता था वही भारत आज किस दिशा में जा रहा है, किस संस्कृति को अपना रहा है, क्यों हमारे माता – पिता की सेवा ही बोझ लगने लगी है ? पुरातन भारत में लोग हिलमिल कर एक ही घर में रहते थे, वही आज इस आधुनिक भारत में हम दो हमारे दो, हमारा करियर, हमारी ज़िंदगी के अलावा हम किसी को अपनाते ही नहीं है। रिश्तों में घुलती मीठास अब फीकी पड़ने लगी है। भाई – भाई अलग हो गए हैं और माता – पिता को साथ में रखना बोझ समझने लगे हैं। हर जगह वृद्धाश्रम खुल गए है क्या यह हमारी संस्कृति के लिए शर्म की बात नहीं है ? 65 वर्ष की आयु के बाद कि अवस्था वृद्धावस्था है । इस अवस्था में व्यक्ति की कार्यक्षमता तथा शक्ति क्षीण होने लगती हैं। उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं समझी जाती हैं, क्या उसका परित्याग करना हमारे लिए उचित है ?

देश में अब तक वृद्धाश्रमों की कोई गिनती नही की गई है, लिहाजा वृद्धाश्रमों का अब तक कोई निश्चित आंकड़ा नही है, किन्तु इस बात से कोई व्यक्ति नही मुकर सकता कि दिन – ब – दिन वृद्धाश्रमों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है। जिन माँ बाप ने हमे चलना सिखाया, हमें बोलना सिखाया, हमें इतना बड़ा किया, अपने पैरों पर खड़ा होने में हमारी सहायता की, उन्होंने कभी हमें बोझ नहीं माना और आज जब उन्हें हमारी आवश्यकता है तब हम उन्हें बोझ समझ रहे है। भारत देश में आज 60 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसे है जो घरो में अपने ही बच्चों के द्वारा किए गए अत्याचारों को सहन करते रहते हैं, उनकी जरूरतों का कभी खयाल नही रखा जाता, सुबह शाम उन्हें ताने मारे जाते हैं, और यह कहकर उनकी अवहेलना कर दी जाती हैं कि आप किसी काम के ही नहीं है, आपसे कोई कार्य हो ही नहीं पाता है। इस आधुनिक भारत में क्या हम इतने आधुनिक हो गए हैं कि हम बुजुर्गों का मान – सम्मान करना, उनकी देखभाल करना, उन्हें सहारा देने को एक तुच्छ कार्य समझने लगे हैं।

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बुजुर्गों पर बढ़े अत्याचार-

गैर सरकारी संगठन हेल्प एज इंडिया के सर्वेक्षण बताते हैं कि बुजुर्गों पर अत्याचार के आकड़े दोगुने होते जा रहे हैं 8 राज्यों के 12 शहरों में किये गए सर्वेक्षण के आधार पर यह बात सामने आई है कि पुरूष बुजुर्गों की तुलना में महिलाओं पर ज्यादा अत्याचार होते है, हमेशा से हम सुनते आए हैं कि सास, बहू पर अत्याचार करती हैं । लेकिन अब यह बात उलट गयी है, राजस्थान की कहानी कुछ ओर ही है यहाँ पर हुए एक सर्वे के अनुसार करीब एक तिहाई बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहु से प्रताड़ित है। एक सर्वेक्षण में यह चौकाने वाली बात सामने आई हैं कि 64 प्रतिशत पीड़ित बुजुर्गों को पुलिस हेल्पलाइन और इससे निपटने वाली प्रणाली के बारे में जानकारी थी लेकिन केवल 12 प्रतिशत ने ही इसका सहारा लिया इसमें से 53 प्रतिशत ने अपने सगे संबंधियों को जुल्म के बारे में बताया जबकि 42 प्रतिशत ने दोस्तों को बताया।
आधुनिक भारत की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि बुजुर्गों पर अत्याचार करने वाले उन्हीं के परिवार वाले होते हैं। आंकड़े गवाह हैं कि 61 प्रतिशत दामाद और 59 प्रतिशत बेटे अपने बुजुर्गों के ऊपर अत्याचार करते हैं। हेल्पेज इंटरनेशनल नेटवर्क ऑफ चैरिटीज द्वारा तैयार ग्लोबल एज वॉच इंडेक्स 2015 में 96 देशो में भारत का बुजुर्गों पर अत्याचार के मामले में 71वां स्थान है आधे से ज्यादा मामले ऐसे हैं जिनमे बुजुर्गों को खाना तक नहीं दिया जाता हैं। इस आधुनिक भारत की आधुनिकता में हम भूल गए कि जब हम बालक थे तब हमारे माता पिता ने स्वयं को भूलकर हमारी परवाह की थी। हमारी देखभाल करते करते उन्होंने कई कष्ट सहे है, अपनी जरूरतें छोड़ उन्होंने हमारी इच्छाओं की पूर्ति की है। और आज हम उन्ही की अवहेलना करते है ।

इस आधुनिक भारत में हम उन्हें मान – सम्मान, इज्जत, प्यार सब देना भूल गए हैं। हमारी संस्कृति को हम भूलते जा रहे हैं, हम भूलते जा रहे हैं कि जैसा हम व्यवहार करते हैं वही घर के बच्चे देख कर हमारा अनुसरण करते हैं। आज जो हमारे बुजुर्ग है वह भी कभी युवा थे, उसी प्रकार हम युवा है और कभी हम भी वृद्ध होंगे तब हमारे बच्चे जो उन्होंने हमें करते देखा है वह व्यवहार हमारे ही साथ करेंगे। क्या हम स्वयं के साथ इस प्रकार के व्यवहार को सहन कर पायेंगे ?

निष्ठुर आधुनिक भारत

बचपन और बुढ़ापा दोनो जीवनकाल की दो ऐसी अवस्थायें होती हैं जब व्यक्ति को देखभाल की और स्नेह की आवश्यकता सबसे अधिक होती है। अधिकतर सम्पत्ति के मामले में या आपसी मतभेद को लेकर बुजुर्गों के साथ मारपीट तक कर दी जाती हैं, उनके साथ बेहद बुरा सलूक किया जाता है। उन्हें जंजीरों से बांधकर रखा जाता है, तथा कई घरों में माता पिता का बंटवारा कर दिया जाता है। माँ को एक भाई के पास तथा पिता को दूसरे भाई के पास रखा जाता है । जिंदगी भर एक दूसरे का साथ देने वाले दंपत्ति को वृद्धावस्था में एक दूसरे से अलग कर दिया जाता है । कई जगहों पर तो अपनी संतानों के द्वारा माता पिता को संभालने के लिए समय बांटा जाता हैं। यदि दो भाई हो तो 6-6 महीने का समय बांटा जाता है यदि 3 हो तो 4-4 महीनों का समय बांट दिया जाता है। किंतु उनकी आवश्यकता पूरी नही हो पाती इतना निष्ठुर हो गया है हमारा आधुनिक भारत ?

सरकार द्वारा बनाये गए कानूनों का उपयोग भी बहुत ही कम लोग कर पाते हैं। वे लोग बच्चों के मोह में या बदनामी के डर से अत्याचार झेलते रहते हैं तथा कुछ व्यक्तियों को अपने ही घर में पालतू जानवरों की तरह कैद करके रखा जाता हैं। जो अपनी बची हुई ज़िन्दगी को खुल कर जीना चाहते हैं वे वृद्धाश्रम चले जाते हैं। इस आधुनिक भारत में केवल 20 प्रतिशत बुजुर्ग ही ऐसे होंगे जिनके बच्चे उन्हें अपनाते होंगे उनकी सेवा करते होंगे उन्हें खुश रखते होंगे। हम भूल जाते है कि वृद्ध तजुर्बे की खान होते है।

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आज सभी व्यक्ति बात करते हैं बच्चों के संस्कारों की, जब घर  मे बुजुर्गों की छत ही नही रहेगी तो बच्चे संस्कार कहाँ से सीख कर आएंगे । वृक्ष का तना जब टूट जाता हैं तब उसकी पत्तियां हरी – भरी कैसे रह सकती है ? उसी प्रकार यदि घर में बड़े बुजुर्ग ही नहीं रहेंगे तो हमे ज़िन्दगी में सही मार्ग कौन दिखायेगा, हमे सलाह कौन देगा, बच्चों में संस्कार कहां से आएंगे ? बुजुर्ग हमसे स्नेह करते हैं, प्रेम बाँटते है और बदले में हमसे सम्मान ही तो चाहते है। सलाह जो बहुत अनमोल होती हैं और पहले हर जगह मिल जाया करती थी वही आज छिन्न भिन्न सी घायल अवस्था में दिखाई देती है। यकीनन आज बहुत तरक्की कर ली है विज्ञान ने किन्तु अपनत्व अब कहीं खो सा गया है। अब वो संयुक्त परिवार दिखाई नहीं पड़ते, बच्चे अब माता पिता का सम्मान नहीं करते, अब दिखाई देती हैं केवल लाचारी।

व्यक्ति जब वृद्ध होता है तब वह एक छोटे शिशु के समान हो जाता हैं, हमारे माता पिता ने हमें बालक से युवा बनाया, हमे दुलारा, प्यार दिया और आज उन्हें ही बोझ समझा जा रहा है। आज कुछ देना नही है हमे उन्हें, बस उनका उन्ही को चुकाना है, जिन्होंने हमारी खातिर अपनी ज़िंदगी की सारी खुशियाँ लुटा दी।

दीपिका अहिर

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