निजीकरण के खिलाफ एकजुट हुआ बीएमएस, जाट भवन में जिला बैठक आयोजित

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– निजीकरण दीमक की तरह कर्मचारियों को कर रहा है खोखला – मुकेश सोलंकी
हनुमानगढ़। 
भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) की जिला बैठक का आयोजन जाट भवन में जिलाध्यक्ष कुलदीप शर्मा की अध्यक्षता में किया गया। बैठक में विभिन्न विभागों के श्रमिक संगठनों के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर निजीकरण के मुद्दे पर गंभीर चर्चा की और एकजुट होकर संघर्ष करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत दत्तोपंत ठेंगड़ी एवं भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर की गई। इस अवसर पर उपस्थित सभी पदाधिकारियों ने श्रमिक एकता और संगठन की मजबूती का संकल्प दोहराया। बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान विद्युत श्रमिक महासंघ के प्रभारी मुकेश सोलंकी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में डिस्कॉम श्रमिक संघ के महामंत्री सतीश राठौड़, जलदाय संघ के प्रदेश महामंत्री इंद्राज घोटिया तथा जलदाय संगठन मंत्री अंग्रेज सिंह शामिल रहे।
बी एम एस जोधपुर संभाग संगठन मंत्री लवजीत पंवार  ने बताया कि इस बैठक का मुख्य उद्देश्य सभी विभागों के कर्मचारियों को एक मंच पर लाकर निजीकरण के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना है।
बीएमएस जिला मंत्री संदीप सिरावता ने बैठक के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्तमान समय में विभिन्न सरकारी विभागों में तेजी से निजीकरण की प्रक्रिया चल रही है, जिससे कर्मचारियों के भविष्य, सेवा शर्तों और रोजगार सुरक्षा पर संकट मंडरा रहा है।
मुख्य अतिथि मुकेश सोलंकी ने अपने संबोधन में कहा कि निजीकरण एक दीमक की तरह है, जो धीरे-धीरे सभी विभागों के कर्मचारियों को खोखला कर रहा है। यदि समय रहते इसका विरोध नहीं किया गया तो सरकारी तंत्र पूरी तरह निजी हाथों में चला जाएगा। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित रहना होगा। सोलंकी ने पाली जिले का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां कर्मचारियों की एकजुटता के कारण निजीकरण की प्रक्रिया को रोका गया है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। इसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए निरंतर संघर्ष और संगठनात्मक मजबूती आवश्यक है।
अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि निजीकरण से न केवल कर्मचारियों की नौकरी असुरक्षित होती है, बल्कि आम जनता को मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच पर भी असर पड़ता है। उन्होंने सरकार से कर्मचारी हितों की रक्षा करने और निजीकरण की नीतियों पर पुनर्विचार करने की मांग की।

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