ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग की भारी कीमत चुकाएगा भारत, जानिए क्या है पूरा मामला?

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मिडल ईस्ट में बढ़ती भू-राजनीतिक हलचल का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। ईरान से जुड़े टकराव और इज़रायल तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है। भारत को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। पहली, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और दूसरी, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। अनुमान है कि महज चार दिनों में ही देश पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ चुका है।

तेल की कीमतों के अलावा मुद्रा विनिमय दर भी बड़ी भूमिका निभाती है। भारत का वार्षिक तेल आयात बिल लगभग 160 अरब डॉलर के आसपास है। यदि डॉलर के मुकाबले रुपया 1 रुपये कमजोर होता है, तो सालाना लगभग 16,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाता है। इसे चार दिनों के अनुपात में देखें तो प्रतिदिन लगभग 44 करोड़ रुपये और चार दिनों में करीब 175–180 करोड़ रुपये का असर पड़ता है।

देश की ऊर्जा (oil crisis) आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात पर टिका हुआ है। कच्चे तेल की मांग का करीब 90 प्रतिशत आयात के जरिये पूरा किया जाता है। वहीं रसोई गैस की जरूरत का लगभग 60 से 65 प्रतिशत और एलएनजी की खपत का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा भी बाहर से आयात किया जाता है।

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इन आपूर्तियों का अधिकांश भाग पश्चिम एशिया से पहुंचता है और अधिकतर खेप होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से ही गुजरती है। युद्ध जैसी परिस्थितियों होने के कारण सप्लाई पूरी तरह से बाधित हो सकता है। जिसके कारण एक बड़ा ऊर्जा संकट आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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तेल महंगा होने से बढ़ता दबाव
भारत प्रतिदिन करीब 50 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत औसतन 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो रोजाना 50 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। यदि डॉलर का औसत मूल्य 91 रुपये माना जाए, तो यह लगभग 455 करोड़ रुपये प्रतिदिन का अतिरिक्त खर्च बनता है। इस तरह केवल चार दिनों में तेल की कीमतों में वृद्धि से करीब 1,820 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार बढ़ चुका है।

होर्मुज स्ट्रेट पर संकट गहराया, विश्व की इकोनॉमी को होगा तगड़ा नुकसान
कच्चे तेल की कीमतों पर S&P Global ने अपनी रिपोर्ट जारी की है। कहा है, अगर होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली आवाजाही में यह रूकावट एक सप्ताह तक बनी रहती है, तो इसे ऐतिहासिक घटनाओं में शामिल किया जाएगा. साल 2026 में जनवरी और फरवरी महीने में होर्मुज स्ट्रेट से हर दिन 2.08 करोड़ बैरल कच्चा तेल और दूसरे उत्पाद की आवाजाही हुई है. इनमें से 82 प्रतिशत एशियाई बाजारों में पहुंची।

एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, अगर इस रास्ते को बंद कर दिया जाता है तो ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जिससे देशों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। अगर यह रूकावट ज्यादा समय तक चलती है तो, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आएगी।

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