किसान हितों की आड़ में टकराव, बैठक में कोरम और प्रोसिडिंग पर उठा सवाल
हनुमानगढ़। भूमि विकास बैंक की संचालन मंडल की बैठक बुधवार को हनुमानगढ़ जंक्शन स्थित बैंक परिसर में हुई, लेकिन बैठक से अधिक चर्चा उस विवाद की हो रही है जिसने बैठक को दो फाड़ कर दिया। एक ओर जहां बैंक के अध्यक्ष राजेन्द्र सिहाग ने बैठक को सफल बताते हुए महत्वपूर्ण प्रस्तावों को पारित करने का दावा किया, वहीं सचिव पीठदान चारण ने बैठक को अमान्य करार देते हुए कोरम और नियमों की अवहेलना की बात कही।
बैठक नियमानुसार संचालन मंडल के 12 निर्वाचित सदस्य तथा 4 राज्य सरकार द्वारा नामित सदस्य- जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक, उपरजिस्ट्रार सहकारी समिति और बैंक सचिव इन 16 सदस्यों की उपस्थिति में होनी थी। लेकिन बैठक के दौरान उपस्थिति को लेकर विवाद शुरू हो गया। जिला परिषद और कृषि विस्तार निदेशालय की ओर से प्रतिनिधियों की उपस्थिति को लेकर सवाल खड़े हुए।
कोरम को लेकर गहराया विवाद
बैठक शुरू होने से पहले ही संचालन मंडल के सदस्य योगेश झोरड़ ने विरोध जताते हुए कहा कि नियमों के अनुसार किसी भी सदस्य का प्रतिनिधि बैठक में मान्य नहीं है। उन्होंने बैठक की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकारी अधिकारियों के प्रतिनिधियों को बैठक में भाग लेने की अनुमति है, तो फिर बाकी गैर-हाजिर सदस्यों के प्रतिनिधियों को भी अनुमति क्यों नहीं दी जा रही?
इस मुद्दे पर जब अन्य अनुपस्थित सदस्यों के प्रतिनिधियों ने भी बैठक में भाग लेना शुरू किया, तो विवाद और गहरा गया। बहस इतनी बढ़ गई कि अध्यक्ष राजेन्द्र सिहाग को सुरक्षा गार्ड को बुलाकर बैठक में हंगामा कर रहे सदस्यों को बाहर निकालने के निर्देश देने पड़े। स्थिति तनावपूर्ण हो गई और संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार के प्रतिनिधि बैठक बीच में ही छोड़कर चले गए।
अध्यक्ष ने स्वयं संभाली कमान, सचिव ने किया प्रोसिडिंग से इंकार
विवाद के इस माहौल में जब अध्यक्ष राजेन्द्र सिहाग ने सचिव पीठदान चारण से बैठक की प्रोसिडिंग लिखने को कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया। सचिव ने कहा कि जब बैठक की वैधता ही संदिग्ध है और कोरम पूरा नहीं है, तो वह ऐसी बैठक की कार्यवाही नहीं लिख सकते। इसके बाद अध्यक्ष ने स्वयं प्रोसिडिंग लिखी और बैठक में कई प्रस्ताव पारित कर दिए।
इस पर सचिव पीठदान चारण ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि बैंक के संविधान में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि संचालन मंडल की बैठक के दौरान कोरम पूरा होना आवश्यक है और सभी प्रस्ताव तभी मान्य माने जाएंगे जब अध्यक्ष व सचिव दोनों की सहमति व हस्ताक्षर हों। उन्होंने कहा कि उन्होंने न तो प्रोसिडिंग लिखी और न ही उस पर हस्ताक्षर किए, इसलिए बैठक में लिए गए सभी प्रस्ताव अमान्य हैं।
आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज
बैठक के बाद अध्यक्ष राजेन्द्र सिहाग ने सचिव पीठदान चारण पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सचिव किसान विरोधी हैं और नहीं चाहते कि किसान भूमि विकास बैंक की योजनाओं का लाभ उठाएं। उन्होंने कहा, पहले चुनावों में स्टे होने के कारण किसान सरकारी योजनाओं से वंचित रहे, अब लंबे समय से सचिव पद पर बैठे पीठदान चारण किसानों को योजनाओं का लाभ नहीं लेने देना चाहते।
वहीं सचिव पीठदान चारण ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा,
मैं सदैव किसान हितैषी रहा हूं। राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हूं। अध्यक्ष मुझ पर दबाव बना कर गलत प्रक्रिया से बैठक की प्रोसिडिंग लिखवाना चाहते थे, जिसे मैंने नियमों के विरुद्ध मानते हुए ठुकरा दिया। चारण ने यह भी स्पष्ट किया कि बैठक के अंत तक कोरम पूरा नहीं हुआ और बिना सचिव के हस्ताक्षर के कोई प्रस्ताव वैध नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस समूची प्रक्रिया को नियमों की खुली अवहेलना बताया।
सदस्य भी दो गुटों में बंटे
बैठक में मौजूद अन्य सदस्यों की राय भी दो भागों में बंटी हुई नजर आई। कुछ सदस्य अध्यक्ष के पक्ष में दिखाई दिए, जबकि कईयों ने सचिव का समर्थन किया। सदस्य योगेश झोरड़ ने कहा, यदि सरकारी अधिकारियों के प्रतिनिधियों को मान्यता दी जा सकती है, तो गैर-हाजिर सदस्यों के प्रतिनिधियों को क्यों नहीं? संविधान में कहीं नहीं लिखा कि प्रतिनिधि को कोरम में जोड़ा जा सकता है।
इस तर्क को अध्यक्ष सिहाग ने खारिज करते हुए कहा कि आवश्यक उपस्थिति के लिए जो भी मौजूद था, उन्हीं के आधार पर बैठक की कार्यवाही आगे बढ़ाई गई।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बैठक वैध मानी जाएगी? क्या अध्यक्ष द्वारा पारित किए गए प्रस्तावों को विभागीय और सरकारी मंजूरी मिलेगी? या फिर सचिव के विरोध और नियमों के हवाले से यह पूरी बैठक खारिज मानी जाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बैठक की कार्यवाही पर सचिव के हस्ताक्षर नहीं हैं और कोरम को लेकर भी नियमों की अनदेखी हुई है, तो संभव है कि प्रस्तावों को तकनीकी आधार पर चुनौती दी जा सके। यह मामला अब केवल बैंक की आंतरिक राजनीति का नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक और कानूनी रूप भी ले सकता है।
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