Malegaon Blast: मालेगांव ब्लास्ट केस में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत सभी आरोपी बरी

मालेगांव केस की शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी। 2011 में केस एनआईए को सौंप दिया गया। 2016 में एनआईए ने चार्जशीट दायर की। इस मामले में 3 जांच एजेंसियां और 4 जज बदल चुके हैं।

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साल 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव (Malegaon Blast) में हुए बम धमाके के मामले में विशेष एनआईए अदालत ने मंगलवार को अपना फैसला सुना दिया। अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में विफल रहा, जिसके चलते आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा किया जा रहा है।

कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 2 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि आतंकवाद का कोई रंग या धर्म नहीं होता हैं। NIA कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन ने ये तो साबित कर दिया कि मालेगांव में धमाका हुआ था, लेकिन वे ये साबित करने में नाकाम रहे कि बाइक में बम प्लांट किया गया।

क्या है मालेगांव बम ब्लास्ट
यह मामला 29 सितंबर 2008 को मालेगांव के भीड़भाड़ वाले भिक्कू चौक इलाके में हुए एक बम धमाके से जुड़ा है। उस विस्फोट में छह लोगों की जान गई थी और सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। जांच में पता चला कि धमाका एक मोटरसाइकिल में लगाए गए आईईडी डिवाइस से किया गया था।

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कैसे आया प्रज्ञा ठाकुर का नाम केस में
शुरुआत में मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी, जिसने 2009 में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और कुछ अन्य लोगों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद 2011 में यह केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपा गया। एनआईए ने अपनी जांच में दावा किया कि धमाके की साजिश एक कट्टरपंथी संगठन अभिनव भारत से जुड़े कुछ लोगों ने रची थी। एजेंसी ने दावा किया कि आरोपियों के पास से विस्फोटक, हथियार और साजिश से जुड़े कई दस्तावेज बरामद किए गए थे।

इस केस में करीब 323 गवाहों की गवाही ली गई। इनमें से 34 गवाह बाद में अपने बयान से मुकर गए। कई सबूतों को अदालत ने स्वीकार नहीं किया, और अंततः अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल नहीं हो सका। 17 साल की लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा कर दिया।

पीडित परिवार ने क्या कहा?
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर इस समय भाजपा की लोकसभा सांसद हैं। उनकी गिरफ्तारी को लेकर पहले भी राजनीतिक विवाद हुआ था, और इस फैसले के बाद फिर से राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हो सकती है। हालांकि, पीड़ित परिवारों ने फैसले पर निराशा जताई है और उच्च अदालत में अपील की संभावना जताई है।

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इस केस में क्या कुछ बदला
इस केस की शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी। 2011 में केस एनआईए को सौंप दिया गया। 2016 में एनआईए ने चार्जशीट दायर की। इस मामले में 3 जांच एजेंसियां और 4 जज बदल चुके हैं। इससे पहले 8 मई 2025 को फैसला आने वाला था, लेकिन बाद में इसे 31 जुलाई तक के लिए सुरक्षित रख लिया था।

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