तेरापंथ सभा भवन में आचार्य तुलसी संयम शताब्दी वर्ष का भव्य आयोजन

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– मुनि श्री सुमति कुमार जी के सानिध्य में मनाया गया आचार्य तुलसी का 100वां दीक्षा दिवस, श्रद्धा व संस्कारों से सराबोर हुआ कार्यक्रम
हनुमानगढ़। 
गणधिपति आचार्य तुलसी संयम शताब्दी वर्ष के अवसर पर शनिवार को तेरापंथ सभा भवन, हनुमानगढ़ टाउन में उनका 100वां दीक्षा दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिकता के वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम मुनि श्री सुमति कुमार जी ठाणा-3 के सानिध्य में आयोजित हुआ। सबसे पहले महिला मंडल द्वारा ‘तुलसी अष्टकम’ का सुमधुर सगान कर मंगलाचरण किया गया, जिससे सभा भवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।मुनि श्री देवार्य कुमार जी ने आचार्य तुलसी के जीवन और उनके अवदानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य तुलसी जन्म से ही विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे। उनका जन्म 20 अक्टूबर 1914 को राजस्थान के लाडनूं में झूमरमल खरेर और वंदना देवी के घर हुआ। मात्र 11 वर्ष की आयु में 5 दिसंबर 1925 को उन्होंने तेरापंथ धर्मसंघ के आठवें आचार्य कालूगणी से दीक्षा ग्रहण कर संयम पथ को अपनाया। आगे चलकर 26 अगस्त 1936 को मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्हे तेरापंथ धर्मसंघ का सम्पूर्ण दायित्व सौंपा गया। 18 फरवरी 1994 को उन्होंने स्वेच्छा से आचार्य पद त्यागकर युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य पद पर आसीन किया। मुनि श्री सुमति कुमार जी ने कहा कि आचार्य तुलसी केवल जैन समाज के ही नहीं, बल्कि समस्त मानवता के संत थे। वे एक क्रांतिकारी चिंतक थे, जिन्होंने 1949 में अणुव्रत आंदोलन की शुरुआत कर नैतिक मूल्यों की नई दिशा दी। उनके द्वारा स्थापित श्रमण श्रेणी के कारण आज जैन धर्म विश्वभर में अपनी पहचान स्थापित कर पाया है। वे विभिन्न सम्प्रदायों के मतभेदों के बावजूद सदैव जैन एकता के मुखर समर्थक रहे। आचार्य तुलसी ने 84 वर्षों में लगभग 62 हजार किलोमीटर की पदयात्रा की और 776 साधु-साध्वियों को दीक्षा प्रदान कर धर्मसंघ को समृद्ध किया।साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अनुपम रहा। लगभग 100 से अधिक साहित्यिक कृतियाँ उन्होंने समाज को समर्पित कीं, जिनसे आज भी जनमानस प्रेरणा ले रहा है। यहां तक कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक में उन्हें विशिष्ट व्यक्तित्वों में शामिल कर सम्मानित किया।सभा अध्यक्ष संजय बांठिया ने भी आचार्य तुलसी के बहुआयामी योगदानों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन केवल जैन समाज के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आदर्श है। महिला मंडल द्वारा साध्वी लावण्य यशा जी, साध्वी नैतिक प्रभा जी और साध्वी सूरजप्रभा जी की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को और अधिक भावपूर्ण बना दिया। दो नन्हे बालकों अक्षित और लक्षित ने मनमोहक गीतिका प्रस्तुत की। श्रीमती निशा बांठिया ने अपनी मधुर आवाज़ में भजन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।कार्यक्रम में तेरापंथ सभा, महिला मंडल, युवक परिषद सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहीं और आचार्य तुलसी के पावन स्मरण में भावपूर्ण योगदान दिया।

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