हनुमानगढ़। विश्व की सभी चिकित्सा पद्धतियों में प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) सबसे प्राचीन और प्रकृति-सम्मत प्रणाली मानी जाती है। यह पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—पर आधारित होने के कारण मानव शरीर के नैसर्गिक स्वरूप से सीधा संबंध स्थापित करती है। “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” के सिद्धांत के आधार पर प्राकृतिक चिकित्सा यह मानती है कि मानव शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित है और इन्हीं तत्वों के माध्यम से रोगों का उपचार संभव है।
भारत में प्राकृतिक चिकित्सा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है। उन्होंने 18 नवंबर 1945 को पुणे में प्राकृतिक चिकित्सा संगठन की स्थापना की थी। इसी ऐतिहासिक महत्व को स्वीकारते हुए भारत सरकार ने 18 नवंबर को प्राकृतिक चिकित्सा दिवस घोषित किया है। जिस प्रकार देश में आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्ध चिकित्सा पद्धतियों के लिए विशिष्ट दिवस निर्धारित किए गए हैं तथा 21 जून को पूरे विश्व में योग दिवस मनाया जाता है, उसी प्रकार प्रकृति-आधारित उपचार की महत्ता को रेखांकित करने के लिए प्रतिवर्ष 18 नवंबर को प्राकृतिक चिकित्सा दिवस मनाया जाता है।
प्राकृतिक चिकित्सा का मूल सिद्धांत है—शरीर को शुद्ध रखना और दूषित पदार्थों को बाहर निकालना। इस पद्धति में माना जाता है कि जब शरीर में कोई विकार नहीं रुकता, तो रोग स्वतः दूर हो जाते हैं। शरीर के नियमित शोधन के लिए उपवास को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जैन धर्म में उपवास और तपस्या का जो आध्यात्मिक महत्व बताया गया है, प्राकृतिक चिकित्सा उसे वैज्ञानिक दृष्टि से स्वास्थ्य से जोड़ती है। उपवास शरीर की विश्राम प्रक्रिया को सक्रिय करता है, विषैले पदार्थों की निर्गमन प्रक्रिया को बढ़ाता है और मन को शांत व स्थिर करता है।
प्रकृति के पंचतत्त्वों—पृथ्वी (मिट्टी स्नान/मड थेरेपी), जल (जल-चिकित्सा), अग्नि (सूर्य-स्नान/हॉट थेरेपी), वायु (शुद्ध हवा/प्राणायाम) और आकाश (उपवास/शारीरिक-मानसिक खालीपन)—के माध्यम से उपचार की प्रणाली व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करती है। प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर को एक पूर्ण इकाई मानकर उपचार किया जाता है। इसमें माना गया है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की प्राप्ति का आधार स्वस्थ शरीर है। यदि शरीर निरोग हो, तो जीवन के सभी लक्ष्य सहजता से प्राप्त किए जा सकते हैं।
इस चिकित्सा पद्धति में आहार का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। “जैसा हम खाएँगे, वैसा ही सोचेंगे”—यह सिद्धांत प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य आधार है। सात्त्विक, शुद्ध और सरल आहार न केवल शरीर को बल्कि मन और विचारों को भी शुद्ध करता है। हंसी को भी मन की गांठें खोलने वाला प्राकृतिक उपचार माना गया है, क्योंकि मन की प्रसन्नता शरीर को रोगों से लड़ने में सक्षम बनाती है।
जैन दर्शन में तपस्या का जो महत्व बताया गया है, वह प्राकृतिक चिकित्सा की प्रक्रिया से अद्भुत रूप से मेल खाता है। भगवान महावीर ने तप को आत्मा की शुद्धि का साधन बताया है। तप से कर्मों का आवरण हटता है, पुराने संस्कार और रोगजनक प्रवृत्तियाँ नष्ट होती हैं और आत्मा अपने स्वरूप में प्रकट होती है। जैसे जल से वस्त्र का मैल छूट जाता है, वैसे ही तप एवं उपवास से शरीर और आत्मा दोनों के दाग मिट जाते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा न केवल रोगों के उपचार का माध्यम है, बल्कि यह एक जीवन शैली, एक कला और एक जागरूकता है। यह मन, शरीर और आत्मा के सामंजस्य पर आधारित संपूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग दिखाती है। आज के युग में, जब तनाव, प्रदूषण और असंतुलित जीवनशैली ने स्वास्थ्य को चुनौती दी है, तब प्राकृतिक चिकित्सा आधुनिक समाज के लिए एक आशा की किरण बनकर उभर रही है।
प्राकृतिक चिकित्सा दिवस के अवसर पर सभी नागरिकों के लिए यही संदेश है कि वे अपनी दिनचर्या में प्रकृति को स्थान दें, प्राकृतिक नियमों का पालन करें और प्रकृति के करीब रहकर स्वस्थ जीवन का आनंद लें।
(डॉ. शिवकुमार शर्मा, पूर्व वरिष्ठ चिकित्सक, राजकीय प्राकृतिक चिकित्सालय हनुमानगढ़ एवं सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी)
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