भारत ने इस बार गणतंत्र दिवस समारोह के लिए यूरोपीय यूनियन (eu leaders in india) के शीर्ष नेताओं को मुख्य अतिथि बनाकर बड़ा संदेश दिया है। यूरोपीय यूनियन किसी एक देश की तरह नहीं, बल्कि 27 देशों के ब्लॉक की तरह काम करता है। भारत ने इसके टॉप-2 लीडर्स को बुलाकर पूरे यूरोप को एक साथ साधने की कोशिश की है।
इसमें पहला नाम उर्सुला वॉन डेर लेयेन यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष का है। यह EU की एग्जिक्यूटिव विंग है, जो ट्रेड डील और रूल्स को लागू करती है।वहीं दूसरा नाम एंतोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष हैं। यह सभी 27 देशों के राष्ट्राध्यक्षों का रिप्रेजेंटेशन करते हैं और स्ट्रैटजिक डायरेक्शन तय करते हैं।
यह फैसला सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि भारत की बदलती विदेश नीति और वैश्विक रणनीति को दिखाता है। भारत और यूरोपीय यूनियन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। व्यापार, निवेश, तकनीक, जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर दोनों पक्ष मिलकर काम कर रहे हैं। ऐसे में गणतंत्र दिवस जैसे बड़े मंच पर EU के नेताओं को बुलाना आपसी भरोसे और साझेदारी को दर्शाता है।
क्या होगा भारत और यूरोपीय यूनियन के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से
- भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच होने वाला फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA 18 साल की लंबी चर्चा के बाद अपने अंतिम पड़ाव में है। इसके 24 में से 20 चैप्टर्स फाइनल हो चुके हैं। उम्मीद है कि 27 जनवरी 2026 को होने वाले भारत-EU शिखर सम्मेलन में इसका ऐलान होगा।
- 16 जनवरी को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे मदर ऑफ ऑल डील्स बताया। भारत को उम्मीद है कि ये डील से भारतीय कपड़े, चमड़े और फार्मा सेक्टर के लिए यूरोप के 45 करोड़ कंज्यूमर्स वाला बाजार खुलेगा।
- 20 जनवरी को दावोस की वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में उर्सुला ने भी इस डील को मदर ऑफ ऑल डील्स बताते हुए कहा, ‘इस समझौते से 200 करोड़ ग्राहकों का मार्केट बनेगा। ये ग्लोबल GDP का लगभग एक चौथाई होगा।’
अमेरिका-चीन से परेशान यूरोपीय यूनियन
- मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर में EU से नजदीकियां भारत के लिए एक बफर स्ट्रैटजी की तरह काम कर रही है।
- लंबे समय से भारत और EU ने महसूस किया है कि सप्लाई चेन के लिए चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता खतरनाक है। इसे वे कम करना चाहते हैं।
- साथ ही चीन की साउथ चाइना सी में कड़े रुख के चलते दोनों स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप करना चाहते हैं।
- ट्रम्प की टैरिफ धमकियों के बीच यूरोप से भारत मजबूत ट्रेड रिलेशंस बना रहा है। ये भारत को अमेरिका से एक तरह का आर्थिक सुरक्षा कवच देगा।
- क्योंकि अगर अमेरिका ने और कोई कड़ा कदम उठाया तो भारत के लिए अचानक से विदेशी मार्केट बंद नहीं होगा। यूरोप ऑप्शन बनेगा।

आखिर कैसे चुने जाते हैं रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट?
पहले गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को ही मुख्य अतिथि बुलाने की परंपरा शुरू थी। उस वक्त इंडोनेशिया को पहले चीफ गेस्ट के तौर पर चुनना भी एक सिंबोलिज्म था। क्योंकि दोनों देश हाल ही में आजाद हुए थे और औपनिवेशिक शासन के लिए खिलाफ लड़े थे। दरअसल, 17 अगस्त 1945 को इंडोनेशिया ने आजादी का ऐलान किया था, जिसे 1949 में मान्यता मिली थी। इसके बाद ये सिलसिला लगातार जारी है।
लेकिन इसके पीछे एक पूरा प्रोसेस है कि रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट कौन होंगे और किस लिए होंगे। जिसमें डिप्लोमेसी, ट्रेड, स्ट्रैटजी और मिलिट्री फायदे का बारीकी से एनालिसिस किया जाता है। ये इसलिए क्योंकि भारत आने वाले दिनों में किन देशों के साथ मिलकर क्या काम करने वाला है। जैसे इसबार यूरोपीय यूनियन के साथ भारत की फ्री ट्रेड एग्रीमेंट डील सबसे बड़ी मानी जा रही है।
बता दें, गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि को चुनना एक जटिल प्रक्रिया है। ये प्रोसेस करीब 6 महीने पहले ही शुरू कर दी जाती है। भले ही 26 जनवरी का कार्यक्रम रक्षा मंत्रालय की जिम्मे है, लेकिन मुख्य अतिथि चुनने का काम विदेश मंत्रालय करता है।
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