नेपाल (nepal protests) इस वक्त सुर्खियों में है। सोशल मीडिया बैन और सरकार के खिलाफ गुस्से में उतरे Gen-Z प्रोटेस्ट ने पूरे देश की राजनीति को हिला कर रख दिया है। संसद भवन पर धावा, पुलिस और सेना की फायरिंग, कई लोगों की मौत और कर्फ्यू यह सब बताता है कि नेपाल की राजनीति अब भी अस्थिरता से घिरी हुई है।
दिलचस्प बात यह है कि ये अस्थिरता कोई नई नहीं है। 2008 में जब नेपाल राजशाही से गणतंत्र बना था, तब उम्मीद थी कि लोकतंत्र नई स्थिरता लाएगा, लेकिन पिछले 17 साल में 15 से ज्यादा बार सरकारें गिर चुकी हैं। आइए जानते हैं नेपाल की राजनीति का इतिहास और कैसे 2008 ने इसे पूरी तरह बदल दिया।
राजशाही का लंबा दौर
नेपाल की राजनीति की शुरुआत शाह वंश से हुई। 18वीं सदी में पृथ्वीनारायण शाह ने देश को एकजुट किया और लंबे समय तक इसे एक हिंदू साम्राज्य के तौर पर चलाया। सदियों तक सत्ता पूरी तरह राजाओं के हाथों में रही और जनता का राजनीतिक अधिकार लगभग शून्य था।
1950-60: लोकतंत्र की शुरुआत लेकिन काम नहीं आयी
1950 के दशक में राणा शासन का अंत हुआ और लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ने लगी। 1959 में पहली बार आम चुनाव हुए, लेकिन यह प्रयोग लंबा नहीं चला। 1960 में राजा महेंद्र ने संसद भंग कर दी और पंचायती व्यवस्था लागू कर दी, जिसमें राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
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नेपाल की 1990 की क्रांति
1990 में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए और राजा को बहुदलीय लोकतंत्र बहाल करना पड़ा। नया संविधान बना और राजनीतिक दलों को सत्ता में जगह मिली। हालांकि, राजा संवैधानिक प्रमुख बने रहे लेकिन सत्ता का असली केंद्र धीरे-धीरे दलों के हाथ में आ गया।
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1996 से 2006: माओवादी विद्रोह
1996 में माओवादी पार्टी ने जनयुद्ध छेड़ा। उनका मकसद था राजशाही को पूरी तरह खत्म करना और गणतंत्र स्थापित करना। इस संघर्ष में 13,000 से ज्यादा लोग मारे गए। इसी दौरान 2001 का राजमहल नरसंहार हुआ जिसमें राजा बीरेन्द्र और शाही परिवार के कई सदस्य मारे गए। इसके बाद राजा ज्ञानेन्द्र सत्ता में आए और उन्होंने फिर से पूर्ण राजशाही लागू करने की कोशिश की।
2006 का जन आंदोलन
राजा ज्ञानेन्द्र की नीतियों के खिलाफ जनता, राजनीतिक दलों और माओवादियों ने मिलकर बड़ा आंदोलन किया। इस दबाव में राजा को पीछे हटना पड़ा और संसद बहाल की गई। यह आंदोलन नेपाल की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
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नेपाल के शाह वंश के राजा और उत्तराधिकार
| क्रमांक | राजा का नाम | शासनकाल (From–To) | किसके बाद राजा बने | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| 1. | पृथ्वीनारायण शाह | 1743 – 1775 | – | नेपाल को एकीकृत किया, शाह वंश की नींव रखी |
| 2. | प्रसुपति नारायण शाह | 1775 – 1777 | पृथ्वीनारायण शाह | बहुत कम समय शासन |
| 3. | रणबहादुर शाह | 1777 – 1799 | प्रसुपति नारायण शाह | कम उम्र में गद्दी पर बैठे |
| 4. | गिरवन यूद्ध विक्रम शाह | 1799 – 1816 | रणबहादुर शाह | अल्पायु में निधन |
| 5. | राजेन्द्र विक्रम शाह | 1816 – 1847 | गिरवन यूद्ध विक्रम शाह | लंबे समय तक शासन, राणा शासन की शुरुआत इन्हीं के दौर में हुई |
| 6. | सुरेन्द्र विक्रम शाह | 1847 – 1881 | राजेन्द्र शाह | असली सत्ता राणा शासकों के हाथ में |
| 7. | प्रताप सिंह शाह | 1881 – 1911 | सुरेन्द्र शाह | नाममात्र के राजा |
| 8. | त्रिभुवन विक्रम शाह | 1911 – 1955 | प्रताप सिंह शाह | 1951 में लोकतंत्र की बहाली में अहम भूमिका |
| 9. | महेन्द्र विक्रम शाह | 1955 – 1972 | त्रिभुवन शाह | संसद भंग कर पंचायती व्यवस्था लागू की |
| 10. | बीरेन्द्र विक्रम शाह | 1972 – 2001 | महेन्द्र शाह | लोकप्रिय राजा, 2001 नरसंहार में मारे गए |
| 11. | दीपेन्द्र विक्रम शाह* | जून 2001 (कुछ दिन) | बीरेन्द्र शाह | राजमहल नरसंहार के बाद नाममात्र राजा बने |
| 12. | ज्ञानेन्द्र विक्रम शाह | 1950–51, फिर 2001–2008 | दीपेन्द्र शाह | अंतिम राजा, 2008 में राजशाही समाप्त हुई |
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साल 2008 नेपाल में पूरी तरह खत्म हुई राजशाही खत्म
28 मई 2008 को नेपाल की संविधान सभा ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राजशाही खत्म कर दी और देश को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। राजा ज्ञानेन्द्र को नारायणहिटी महल छोड़ना पड़ा। नेपाल में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री प्रणाली लागू की गई और यह दुनिया का सबसे नया गणराज्य बन गया।
नेपाल में गणतंत्र बनने के बाद राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद थी, लेकिन हकीकत उलट निकली। 2015 में नया संविधान आया और नेपाल को संघीय ढांचे में बांटा गया। इसके बावजूद यहां गठबंधन सरकारें टिक नहीं पाईं। 2008 से अब तक 14 से ज्यादा प्रधानमंत्री बदल चुके हैं और लगभग 15 बार सरकारें गिर चुकी हैं। यही वजह है कि मौजूदा Gen-Z प्रोटेस्ट को भी लोग नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता की कड़ी मान रहे हैं।
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