युवा राष्ट्रनिर्माण में बाधक या साधक

0
183

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नवभारत की संकल्पना देकर हम लेखको और कलमकारों को एक नया विषय दे दिया है जिस पर हम संवाद एवम बहस कर सके।  हम ‘नवभारत’ या ‘न्यूइण्डिया’ के बारे में बात करते है तो  पहला प्रश्न यह है कैसे?ये मैं इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं किसी से ‘नवभारत’ की बात करता हूँ तो सभी व्यक्ति यही कहते है क्या यह संभव है अगर है तो कैसे?मेरा भी यही प्रश्न है! प्रश्न का कारण यह है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने ‘संकल्प से सिद्धि ‘ नामक कार्यक्रम चलाया तो इसका प्रपत्र मैंने पढ़ा तो भारत को सब प्रकार की दुर्भावनाओं से मुक्त बताने की बात कही है जैसे भ्रष्टाचार मुक्त भारत (ई टेंडर घोटाला, पुलिस वालों का रिश्वत वाला वीडियो) साम्प्रदायिकता मुक्त भारत (बुलन्दशहर हिंसा) गरीबी मुक्त भारत (आज भी लाखों करोड़ों लोग भूख से त्रस्त है) सभी धर्मों को सम्मान (हनुमान जी जाति विवाद) स्त्री सम्मान(आसिफा से लेकर संजली तक) मैंने ये उदाहरण इसीलिए दिए है क्योंकि यह सब उस पार्टी शासित राज्यों में यह सब हो रहा है या हो चुका है। जिसका मुखिया नवभारत की बात कर रहा है जिस पार्टी का कार्यकर्ता संकल्प से सिद्धि कार्यक्रम चला रहे है। अस्तु, हमारे प्रधानमंत्री जी का यही स्वप्न है पर वास्तविकता यह है कि नवभारत का इतना आदर्श स्वप्न नितांत असंभव है। ये असंभव क्यों है क्योंकि राष्ट्र के बहुत ही कम लोग ही इस नवभारत के स्वप्न को साकार करने हेतु प्रतिबद्ध है। जब तक जनसहयोग नही होगा राष्ट्र कैसे विकसित होगा, जनता को ही जरूरत नही है इस आदर्शवादिता की,वो तो अपने ही हाल मे मस्त है उसी में रहना चाहता है। क्योंकि आंच उसके घर तक नहीं आई ,भूखे मरे तो दूसरे मरे,दरिंदगी होती है तो दूसरे के साथ होती है,इसीलिए नवभारत असंभव है। बहरहाल, इस कथित नवभारत के नवचिराग युवाओं की आज के समय क्या स्थिति है उसका विश्लेषण करेंगे।

भारत विश्व में सर्वाधिक युवा राष्ट्र है। इस बात के अन्दर कई अर्थ छिपे हैं। युवा राष्ट्र अर्थात् ऊर्जावान राष्ट्र,मस्तिष्क से समृद्ध राष्ट्र,एक नई सोच वाला राष्ट्र। एक ऐसा राष्ट्र जिसका एक बड़ा समूह ‘इनोवेटिव टैक्नीक्स’ अपनाने वाला हो ।भारत के कुछ युवा इस तरह के है और ज्यादातर युवा दूसरी तरह के ऊर्जा के उपयोग और उपभोग के आधार पर दो प्रकार के युवा होते है –

१.सकारात्मक उपयोग   २. दूसरे नकारात्मक उपयोग वाले

२१ वीं सदी तकनीकी सदी है,जहाँ इन्सान पर तकनीक हावी है। इसी दुनिया में भारत के कुछ युवा अपने विकास एवं प्रतिभा के दम पर राष्ट्र का नाम विश्व में गौरान्वित कर रहे है। आज बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सीईओ हमारे भारतीय है ।सुंदर पिचाई हमारे देश के आईआईटी की देन है। सत्य नडेला और तन्मय भट्ट जैसे युवा भारत को नवनाम एवम नवआयाम दे रहे है। पेटीएम,फ्लिफकार्ट जैसे नवाचार भी भारतीय युवाओं के दिमाग की उपज है। आज कई देशों की कम्पनियां भारतीयों युवाओं को प्रशिक्षण सिखाती है। IIT,IIM में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमारे होनहारों के लिए प्रतिक्षित रहती है ।कई युवा लेखन के क्षेत्र में अपना पथ आगे बढ़ा रहे है। अमिश त्रिपाठी जैसे लेखक भारत की प्राचीन संस्कृति को उपन्यास लिख रहे है। बाबा रामदेव और स्वामी बालकृष्ण युवाओ की फौज तैयार कर रहे है जोपूर्णतः स्वदेशी मापदंडो पर आधारित है। कई युवा वैज्ञानिक कृषि के क्षेत्र में नवाचार कर रहे है। सद्गुरु जग्गी वासुदेव का ‘युवाओं जुडो सत्य से’कार्यक्रम काफी हद तक मेरे जैसे कई युवाओं के पथप्रदर्शक है। यह  वे युवा है जो ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग कर रहे है। जिनके परिश्रम के बल पर आज राष्ट्र उन्नति के नव पथ पर बढ़ रहा है। ये युवा अपने समृद्ध दिमाग की बदौलत राष्ट्र को गौरान्वित कर रहे है।

वहीं दूसरा खेमा है,उन युवाओं का जिनका मानना है कि भगवान ने इक ही ज़िन्दगी दी है,तो उसका मज़ा लो। उनके अनुसार ज़िन्दगी सत्कर्म व सद्ज़ीवन,सदाचार के लिए नहीं है अपितु ज़िन्दगी धुंए में उड़ाने व गिलास में पीने में है ये तनाव कम करने के लिए ध्यान एवम योग का नही गिलास की सहायता ले रहे है। ये आज के अभिनेता एवं अभिनेत्रियों के ३ घन्टे की फिल्म में हुए दृश्य का अनुसरण करते है। उनके जैसी बॉडी उनके जैसी जिंदगी जीने की कोशिश करते है जो पूरी इंडस्ट्री काले धन पर टिकी है और जो राष्ट्र को नीचा दिखाने में कोई कसर नही छोड़ते। ये यह भी  मानते है कि असली ज़िन्दगी D-कम्पनी का मास्टर ही जी रहा है। इनके हिसाब से मनुष्य ख्यात हो चाहिए चाहे ‘सु’ हो या ‘कु’।हमारे कवि वंश के गुरु कबीर एवं निराला ने जो ज़िन्दगी जी, वह एक बेकार,रसहीन ज़िन्दगी थी | अनुपात में इसकी संख्या ज्यादा है। आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति अपनाना,समय के साथ संस्कृति को भी बदलना इनका नजरिया है | इनके माता-पिता इन्हें अतिरिक्त स्नेह देकर संस्कार को दबा देते है। फलस्वरूप जिनके माता-पिता के पास स्वयं का बिजनेस(व्ययसाय) नहीं होते,उनके बच्चे बेरोजगार की श्रेणी में आ जाते है। यही बेरोजगार  नेता का जुलूस हो,विरोध प्रदर्शन करना हो,हो-हल्ला करना हो,वहां ये आने को सर्वथा तैयार रहते है। यदि किसी को मारपीट की आवश्यकता पड़े तो ये एक बुलावे पर अपने साथी विचारधारा के दोस्तों के साथ आ जाते है और हुड़दंग करते है। एक बात जो बोलते हुए इन्हें शर्म नहीं आती पर वह बात इनके लिए सर्वाधिक शर्मनाक है,वह बात है-“मैं फैन भगत सिंह दा” । इन्हें भगत सिंह के बारे में कुछ नहीं पता सिवाय इसके कि भगत सिंह ने फांसी खाई थी। इसी तरह  ये अब खुद को “महाकाल का भक्त” भी बताने लगे है और चरस,गांजा,हुक्का को महाकाल का प्रसाद मैं जब इन्हें पूछता हूँ कि महाकाल के परम भक्त होने का राज क्या है ? तो इनका उत्तर है-“इट्स ए फैशन ब्रो” । मैं निरुत्तर हो गया। पर संस्कृति अगर फैशन बन जाए तो…….या तो संस्कृति नष्ट हो जाएगी या सांस्कृतिक लोग। संस्कृति आत्मा है ,वस्त्र है हमारी।फैशन अपनानी पड़ती है संस्कृति जन्मजात मिलती है।वह भी झूठी फैशन क्योंकि इन्हें महाकाल या भगत सिंह के प्रति उनके कार्यों के प्रति श्रध्दा नहीं है अपितु भेड़ चाल वाली भेड़ों कि तरह ऊपरी श्रद्धा प्रदर्शित कर रहे है। यह कथित श्रद्धा भयानक है क्योंकि मूल तत्व इसमे है ही नही। अस्तु निष्कर्ष ये है कि युवा दो तरह है,सकारात्मक ऊर्जा रखने वाले और सकारात्मक ऊर्जा नहीं रखने वाले उस ऊर्जा का सदुपयोग या दुरुपयोग करना है यह परिवार एवं समाज का दायित्व बन गया है इसीलिए समाज का,शिक्षाविदों का,सरकार का और सबसे महत्वपूर्ण माता-पिता का यह कर्तव्य बनता है कि बच्चों को सत्मार्ग दिखाएँ ।अभी उन्हें जिस समय श्रीमद्भागवत गीता, रश्मिरथी या कामायनी हाथ मे देना चाहिए उस समय उनके हाथों में स्मार्टफोन दे रहे है।उन्हें कबड्डी खो-खो जैसे खेल खिलाने चाहिए ताकि समाज के साथ सामंजस्य,तालमेल बनाना सीखे  उन्हें pubg और अन्य वीडियो गेम खिला रहे है । हमने शिक्षकों पर संस्कार देने का काम सौंप दिया है जबकि शिक्षा संस्कार देना भूल गई है,क्योंकि शिक्षा का कार्य कार देना हो गया है,संस्कार केवल माता-पिता ही दे सकते है। माता पिता उन्हें  देशप्रेम सिखाये,उन्हें गांधी जी का अहिंसा का पाठ पढ़ाये और भगत सिंह का क्रांतिकारी सिद्धांत भी। उन्हें ‘निराला’ की कृतियां  भी पढ़ाये और कबीर की साखिया भी। श्री कृष्ण की राजनीतिक चतुर्यता और राम का मर्यादा पुरूषोत्तम स्वरूप भी। उन्हें मैकोले मत बनाइये जो राष्ट्र की अखंडता उसकी संस्कृति को नष्ट करता हो,उन्हें महाराणा प्रताप पढ़ाइये जो स्वाभिमान का पुजारी हो। अगर वह प्रेम करते है तो उनका आदर्श वेलेंटाइन नही, सावित्री और मां मीरा या राधा कृष्ण होना चाहिये। यह सब माता पिता का कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों को पुस्तकें दे साहित्य दे जिससे वह अपने राष्ट्र पर अभिमान कर सके,घमंड कर सके। युवा असीम ऊर्जा के भंडार है उन ऊर्जा भंडार से परमाणु बम विस्फोट होने से आपको विनाश कराना है या विकास आपके हाथ मे है।मैं मेरी लिखी कुछ पंक्तियां युवाओ को समर्पित करता हूँ और इच्छा रखता हूँ कि वो इसे समझे व अपनाये:

शबाब को यूं न गवाओ ‘राम’
बड़ी मुश्किल से मिलती है
जाम और धुंए से नही
ये तो कर्मो से खिलती है।

रामनिवास भांबू

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य और व्यक्त किए गए विचार पञ्चदूत के नहीं हैं, तथा पञ्चदूत उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है। पञ्चदूत पत्रिका पढ़ना चाहते हैं तो वेबसाइट (www.panchdoot.com) पर जाकर ई-कॉपी डाउनलोड करें। इसके अलावा अगर आप भी अपने लेख वेबसाइट या मैग्जीन में प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो हमें magazine@panchdoot.com ईमेल करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here