अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (donald trump Nobel Peace Prize) को इस साल भी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। रूस, यूक्रेन, इजरायल और पाकिस्तान के कुछ धड़ों के समर्थन के बावजूद नोबेल कमेटी ने यह सम्मान वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो (Maria Corina Machado) को देने की घोषणा की है।
मचाडो को यह पुरस्कार अपने देश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लंबे समय से जारी शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए दिया गया है। उन्होंने वेनेजुएला में सत्तावादी राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन की अगुवाई की है और देश में तानाशाही शासन को समाप्त करने की दिशा में लगातार आवाज उठाई है।
मारिया मचाडो ने परिवर्तन का रास्ता हिंसा या सशस्त्र विरोध से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण जन-आंदोलन और राजनीतिक संवाद के ज़रिए चुना। नोबेल कमेटी ने उनके प्रयासों को “लोकतांत्रिक मूल्यों की वैश्विक रक्षा का प्रतीक” बताया है।
यह पुरस्कार ऐसे समय आया है जब वेनेजुएला में लोकतंत्र को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ रही है। वहां के नागरिक समाज को मचाडो के इस संघर्ष ने नई ऊर्जा और उम्मीद दी है।

दूसरी ओर, ट्रंप समर्थक खेमे को इस घोषणा से झटका लगा है। ट्रंप के समर्थक बीते महीनों में लगातार यह दावा कर रहे थे कि रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता की उनकी पेशकश, इजरायल-फिलिस्तीन विवाद पर दिए गए बयानों और पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों को सुधारने के प्रयासों के कारण वे नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदार हैं। लेकिन नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी ने इस साल भी उनका नाम सूची में शामिल नहीं किया।

विश्लेषकों का मानना है कि मचाडो को यह पुरस्कार देना न सिर्फ वेनेजुएला के लोकतांत्रिक आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय समर्थन देने का संकेत है, बल्कि यह भी संदेश है कि शांति और बदलाव के रास्ते में हिंसा नहीं, बल्कि संवाद और जन-आवाज़ ही सबसे सशक्त हथियार हैं।
डोनाल्ड ट्रंप को क्यों नहीं मिला नोबल पुरस्कार?
डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल कम-से-कम 10 बार अपने लिए नोबेल पुरस्कार की मांग सार्वजनिक रूप से की थी। भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष खत्म कराने का भी वह श्रेय लेते रहे हैं, जिसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप के लिए नोबेल की वकालत की थी। नोबेल शांति पुरस्कार के ऐलान से कुछ घंटे पहले पुतिन ने भी मांग की थी कि ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाए. लेकिन उनके नोबेल पुरस्कार न पाने के कई कारण हैं। आइए समझें।
- नोबेल शांति पुरस्कार का मकसद उन व्यक्तियों या संगठनों को सम्मानित करना है, जो लंबे समय तक चलने वाली शांति और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करते हैं। न कि ऐसे जो एक डील हों। ट्रंप 8 युद्ध रुकवाने का दावा करते हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर समझौते अस्थायी हैं। कई युद्ध तो औपचारिक रूप से कभी घोषित ही नहीं हुए थे। नोबेल कमिटी ने ऐसे राजनीतिक और पब्लिसिटी वाले दावों को शांति की वास्तविक उपलब्धि नहीं मानती।
- सीमित लोकतांत्रिक योगदान : वेनेज़ुएला की मारिया कोरीना मचाडो ने बिना हिंसा के लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया। यह ट्रंप की डील-आधारित कूटनीति से ज्यादा प्रभावी माना गया।
- गाजा समझौता अधूरा: ट्रंप अगर किसी बड़े युद्ध को रुकवा पाए हैं तो वह इजरायल और हमास का है। हालांकि अभी भी गाजा युद्धविराम की पहल अधूरी है। इसे ‘स्थायी शांति’ नहीं माना गया। वहीं यह बात पहले ही साफ हो गई थी कि नोबेल कमेटी ने अपना फैसला गाजा शांति समझौते से पहले ही ले लिया था।
- नोबेल कमेटी का संदेश: इस साल नोबेल कमिटी ने दिखाया कि ‘शांति सौदे से नहीं, साहस और त्याग से आती है।
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