बांग्लादेश में कट्टरपंथ क्यों बेकाबू हो रहा है? ये हैं इसके पीछे 5 विलेन? देखें पूरी लिस्ट

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बांग्लादेश (bangladesh violence) में एक हिंदू युवक की हत्या का मामला अब भारत–बांग्लादेश संबंधों पर असर डालता दिख रहा है। इस घटना के विरोध में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने दिल्ली में बांग्लादेश हाई कमीशन के बाहर प्रदर्शन किया। VHP कार्यकर्ताओं ने बांग्लादेश सरकार से पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।

इस घटना के बीच बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा को तलब किया है। यह महज़ एक हफ्ते के भीतर दूसरी बार है जब भारतीय उच्चायुक्त को बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय में बुलाया गया है। दरअसल, बांग्लादेशी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद वहां भारत विरोधी प्रदर्शन तेज़ हो गए थे। इसके बाद मैमन सिंह जिले में दीपू चंद्र की मॉब लिंचिंग ने हालात को और संवेदनशील बना दिया।

बांग्लादेश में हाल के महीनों में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नतीजा नहीं है। कट्टरपंथ, हिंसा और अस्थिरता की जड़ें कहीं ज़्यादा गहरी हैं। यूनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथ के फैलने के पीछे कम से कम पाँच ऐसे शक्तिशाली किरदार और संगठन हैं, जिन्होंने हालात को विस्फोटक बना दिया है।

1. जमात-ए-इस्लामी: प्रतिबंध हटते ही फिर से सक्रिय हुआ कट्टरपंथ जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का वह इस्लामिक संगठन है जिस पर शेख हसीना के शासनकाल में प्रतिबंध लगाया गया था। लेकिन यूनुस सरकार के सत्ता में आते ही इस बैन को हटा दिया गया, जिसके बाद यह संगठन दोबारा पूरी ताकत के साथ सक्रिय हो गया। अब जमात-ए-इस्लामी खुद को चुनाव सुधारों और लोकतांत्रिक बदलावों की आवाज़ बताता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके खिलाफ गंभीर आरोप लगते रहे हैं। अल्पसंख्यकों पर हमलों, भारत विरोधी प्रदर्शनों और धार्मिक उकसावे में इसकी भूमिका को लेकर सुरक्षा एजेंसियां और विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। इस संगठन पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से संबंध होने के आरोप भी पहले से लगते रहे हैं। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या से जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक रूप से फायदा पहुंच सकता है।

2. हिफाजत-ए-इस्लाम: शरिया कानून के लिए बढ़ता दबाव ईस्ट एशिया फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, हिफाजत-ए-इस्लाम सिर्फ एक संगठन नहीं बल्कि सुन्नी इस्लामवादियों, विशाल मदरसा नेटवर्क और उनके समर्थकों का बड़ा गठजोड़ है। यह संगठन लंबे समय से महिलाओं के अधिकारों और सेक्युलर सुधारों का विरोध करता आ रहा है। महिलाओं को संपत्ति में बराबर का अधिकार देने के प्रस्ताव पर इस समूह ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए थे। हिफाजत-ए-इस्लाम के नेता मामुनुल हक ने यूनुस से मुलाकात कर बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करने का दबाव भी बनाया। शेख हसीना के दौर में जिस संगठन पर पाबंदियां थीं, उसे यूनुस सरकार में खुलकर काम करने और अपनी विचारधारा फैलाने का मौका मिल गया।

3. हिज्ब-उत-तहरीर: युवाओं को कट्टरता की ओर ले जाता नेटवर्क एस. राजारतनम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्ट बताती है कि हिज्ब-उत-तहरीर बांग्लादेश में तेजी से अपने पैर पसार रहा है। यह संगठन सोशल मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों के जरिए युवाओं की भर्ती कर रहा है और उन्हें कट्टर इस्लामिक विचारधारा की ओर मोड़ रहा है। हिज्ब-उत-तहरीर खलीफा शासन की बहाली और शरिया कानून लागू करने की खुली वकालत करता है। 2009 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन 2024 में यूनुस सरकार के दौरान इसे फिर से सक्रिय होने का मौका मिल गया। ढाका में इसके प्रदर्शनों के दौरान ISIS जैसे झंडे लहराए जाने की घटनाओं ने देश और विदेश दोनों जगह चिंता बढ़ा दी है। सरकार पर आरोप हैं कि वह इस संगठन को रोकने में नाकाम रही है।

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4. इंकलाब मंच: छात्र आंदोलन से उग्र इस्लामिक राजनीति तक अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इंकलाब मंच का उदय जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद हुआ। इस संगठन के प्रमुख नेता शरीफ उस्मान हादी कट्टर और भारत विरोधी विचारधारा के लिए जाने जाते थे। शुरुआत में इंकलाब मंच यूनुस सरकार का समर्थक माना जाता था, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया। हादी की हत्या के बाद हालात और बिगड़ गए। इंकलाब मंच ने सरकार को गिराने की धमकियां दीं और हिंसा इस स्तर तक पहुंच गई कि मीडिया संस्थानों और अखबारों के दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया गया। इस संगठन का उद्देश्य भी बांग्लादेश में कट्टर इस्लामिक संस्कृति को लागू करना बताया जाता है।

5. मामुनुल हक और जशीमुद्दीन रहमानी: विचारधारा से आतंक तक बांग्लादेश में कट्टरपंथ को हवा देने में कुछ प्रभावशाली चेहरों की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी, जो अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन अंसारुल्लाह बंग्ला टीम का प्रमुख रहा है, उसे यूनुस सरकार के दौरान रिहा कर दिया गया। इस संगठन पर आरोप है कि यह स्लीपर सेल्स के जरिए जिहादी नेटवर्क फैलाने की कोशिश कर रहा है, जिससे भारत के लिए भी सुरक्षा चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। वहीं मामुनुल हक, जो पहले हिंसा भड़काने के आरोप में जेल जा चुका है, अब फिर से सक्रिय है। वह बांग्लादेश में इस्लामिक सिद्धांतों को सरकारी नीतियों में लागू करने, शरिया कानून की वकालत करने और पारंपरिक इस्लामी एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला प्रभावशाली चेहरा माना जाता है।

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