Pakistan Defence Deal: सऊदी से हाथ मिलाकर पाकिस्तान ने बजाई भारत के लिए टेंशन की घंटी?

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सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Pakistan Defence Deal) और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार को एक रक्षा समझौते पर साइन किए। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला दूसरे पर भी हमला माना जाएगा। सऊदी प्रेस एजेंसी के मुताबिक, दोनों देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट में कहा कि यह समझौता दोनों देशों की सुरक्षा बढ़ाने और विश्व में शांति स्थापित करने की प्रतिबद्धता को दिखाता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच डिफेंस कॉर्पोरेशन भी डेवलप किया जाएगा।

रॉयटर्स के मुताबिक इस समझौते के तहत मिलिट्री सहयोग किया जाएगा। इसमें जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का इस्तेमाल भी शामिल है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के रक्षा समझौते पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार को इसकी जानकारी पहले से थी। विदेश मंत्रालय ने कहा- यह समझौता दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संबंधों को औपचारिक रूप देता है। इससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा, इसकी जांच की जाएगी। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

दोहा पर हमला होने के बाद सारे मुस्लिम देश आए एक साथ
दोनों देशों के बीच यह सुरक्षा समझौता तब हुआ है, जब इसराइल ने क़तर की राजधानी दोहा में हमला किया था और कुछ महीने पहले ही पाकिस्तान की भारत से सैन्य झड़प हुई थी। ऐसे में यह समझौता न केवल दोनों देशों के लिए अहम माना जा रहा है कि बल्कि इससे पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया पर भी प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ 17 सितंबर को सऊदी अरब पहुँचे थे। सऊदी अरब और पाकिस्तान की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि शहबाज़ शरीफ़ को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने न्योता भेजा था।

भारत के लिए झटका क्यों?
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर भारत ने भविष्य में पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर जैसी कोई कार्रवाई की तो क्या सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ आ जाएगा? यही सवाल बीबीसी ने सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज अहमद से पूछा तो उन्होंने कहा, फिलहाल ऐसा नहीं लगता है कि यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका है लेकिन इसे लंबी अवधि में देखें तो भारत के लिए किसी भी लिहाज़ से ठीक नहीं है।

तलमीज़ अहमद कहते हैं, पाकिस्तान पश्चिम एशिया में बहुत प्रासंगिक हो गया है और भारत कहीं नहीं दिख रहा है। खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान, तुर्की और चीन की तरफ़ देख रहे हैं और तीनों देश इस इलाक़े में काफ़ी अहम हो गए हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तीनों देश भारत के ख़िलाफ़ गोलबंद थे. ऐसे में भारत के लिए यह झटका तो ज़रूर है।

सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ भी रक्षा समझौता किया लेकिन हुआ अंत
पाकिस्तान ने सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ भी रक्षा समझौता किया था। हालांकि यह समझौता लंबे समय तक टिक नहीं पाया और 1979 में खत्म हो गया।

1950 के दशक में कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका दक्षिण एशिया में सहयोगियों की तलाश कर रहा था। इसी समय पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन अपनाया।

म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एग्रीमेंट (MDAA), 1954
19 मई 1954 को पाकिस्तान और अमेरिका के बीच यह द्विपक्षीय समझौता हुआ। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे को सैन्य मदद, हथियार, प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराने पर सहमत हुए। यह समझौता अमेरिका के 1949 के Mutual Defense Assistance Act पर आधारित था।

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इसके बाद पाकिस्तान SEATO (1954) और CENTO (1955) जैसे सैन्य संगठनों का हिस्सा भी बना। इनका मकसद सोवियत संघ और कम्युनिस्ट प्रभाव को रोकना था। इन संगठनों के तहत अमेरिका ने पाकिस्तान को 7 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की सैन्य सहायता दी।

1979 में क्यों टूटा समझौता?

  • 1979 में ईरान की क्रांति हुई और शाह के पतन के बाद ईरान ने CENTO छोड़ दिया।
  • पाकिस्तान ने भी मार्च 1979 में इससे हटने का फैसला किया।
  • उसी साल सोवियत आक्रमण के बाद अफगानिस्तान का मुद्दा उठा और पाकिस्तान ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई।
  • इसके साथ ही अमेरिका ने पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर आपत्ति जताते हुए सैन्य मदद पर रोक लगा दी।

इसके साथ ही CENTO पूरी तरह टूट गया और पाकिस्तान-अमेरिका रक्षा गठबंधन भी कमजोर हो गया।

जंग के समय मदद क्यों नहीं मिली?
1947, 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान जंगों में भी अमेरिका ने पाकिस्तान को सीधी सैन्य मदद नहीं दी। दरअसल, ये समझौते और संगठन खासतौर पर सोवियत और कम्युनिस्ट खतरों के खिलाफ बने थे, भारत-पाक विवाद के लिए नहीं। इसी वजह से पाकिस्तान को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और इन गठबंधनों की उपयोगिता पर सवाल उठे।

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