केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। अब इसको कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई है। केरल सरकार चाहती है कि संविधान में भी वही नाम दर्ज हो, जो वहां की स्थानीय भाषा मलयालम में बोला जाता है। इसको लेकर केरल विधानसभा पहले ही दो बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर चुकी है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, अभी संविधान में राज्य का नाम ‘केरल’ लिखा है, जो हिंदी और अंग्रेजी में इस्तेमाल होता है। लेकिन मलयालम भाषा में इसे ‘केरलम’ कहा जाता है। राज्य सरकार का कहना है कि आधिकारिक नाम भी वही होना चाहिए जो स्थानीय भाषा में प्रचलित है।
अगर केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन करना होगा। इसके लिए संसद में बिल लाकर पास कराना जरूरी होगा। साथ ही आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में भी राज्य का नाम “केरलम” दर्ज करना पड़ेगा।
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केरल और केरलम में क्या फर्क है?
असल में दोनों नाम एक ही राज्य के हैं। “केरलम” मलयालम भाषा का मूल रूप है, जबकि “केरल” उसका हिंदी और अंग्रेजी में इस्तेमाल होने वाला रूप है। पहचान, सीमाएं या प्रशासन में कोई बदलाव नहीं होगा। यह सिर्फ नाम के आधिकारिक रूप को लेकर बदलाव होगा।
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भारत में कई राज्यों के नाम स्थानीय भाषा और अंग्रेजी में अलग-अलग रूप में मिलते हैं। ऐसे में यह मामला भी भाषा से जुड़ा बदलाव माना जा रहा है।

क्या है नाम का इतिहास?
इतिहासकारों के मुताबिक, “केरल” शब्द का जिक्र सम्राट अशोक के 257 ईसा पूर्व के शिलालेखों में “केरलपुत्र” के रूप में मिलता है। इससे माना जाता है कि प्राचीन काल में भी इस क्षेत्र को इसी नाम से जोड़ा जाता था।
वहीं “केरलम” शब्द को लेकर अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वान इसे प्राचीन चेरा राजवंश से जोड़ते हैं। जर्मन विद्वान डॉ. हरमन गुंडर्ट, जिन्होंने पहला मलयालम-अंग्रेजी शब्दकोश तैयार किया था, उन्होंने “केरम” शब्द को “चेरम” का रूप बताया और “केरलम” को उसी से जुड़ा माना।
एक और मान्यता के अनुसार “केरलम” शब्द “केरा” से बना है, जिसका मतलब नारियल का पेड़ होता है। चूंकि राज्य में नारियल के पेड़ बहुत ज्यादा हैं, इसलिए इसे “नारियल की भूमि” भी कहा जाता है। अब नजर केंद्र सरकार के फैसले पर है। अगर संसद में संशोधन पास हो जाता है, तो देश के नक्शे पर “केरल” की जगह आधिकारिक तौर पर “केरलम” लिखा जाएगा।
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