पिता ने ही इस काबिल बनाया…

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मैं गिरता था
उठता, फिर गिरता
उन्होंने मुझे चलना सिखाया..

मुझे ये चंद अक्षरों से चिड थी
उन्होंने मुझे पूरी किताब पढ़ना सिखाया..

मुझे नहीं पता था इस दुनियादारी का
उन्होंने मुझे सही गलत में फ़र्क करना बताया..

उनके पास वो फटी – पुरानी कपड़े की जोड़ी
पर मुझे हमेशा नया पहनाया…

उनके पास खाने तक के पैसे कभी नहीं होते थे
पर मुझे शहर के बड़े स्कूल में पढ़ाया….

जब कोई काम में सफल नहीं हो पाता था तो निराश हो जाता
पर उन्होंने मुझे हालात से लड़ना सिखाया…

वो गर्मी में बिन पंखे के सोया करते थे
उन्होंने मेरे पढ़ाई के लिए एक छोटा सा कूलर लगवाया..

मै हर बार कहता बदल दो अपना ये फटा जुता
उन्होंने मुझे पैसे सही जगह खर्च करना सिखाया है…

वो धूप हो छांव हो पैदल ही चला करते है ,
मेरे थकान के चलते उन्होंने एक स्कूटर दिलाया…

वो गांव के है कभी बाहर नहीं गए
पर मुझे बाहर की दुनिया में घुमाया…

वो हर रोज मुझे हंसाने के लिए बहाने ढूंढ़ते थे
पर न जाने हमने कितनी ही बार उन्हें रुलाया…

वो दिल के कमजोर है
पर मुझे चट्टान सा बनाया…

मै पैदा हुआ उनकी जिम्मेदारी और समस्या बढ़ी
पर उन्होंने अपनी जवानी लुटा कर मुझे सच्चा इंसान बनाया…

ज़िन्दगी में हर पल मेरे ही भविष्य के बारे में सोचने वाले
वो मेरे पापा ही है जिन्होंने मुझे इतना कुछ लिखना सिखाया..

वो इन्सान के वेश में मेरे भगवान, उन्होंने हर पल मेरे बारे में सोचा
मुझे आपका प्यार और सम्मान मिले, इस काबिल उन्होंने ही बनाया…

शुभम कश्यप ✍✍