आतंकवाद… एक अमरबेल

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आतंकवाद का विकराल सर्प आज सम्पूर्ण विश्व को अपने चंगुल में जकड़कर अपना विषैला फन फैलाये फुफकार रहा है। संसार का शायद ही कोई कोना अब इससे अछूता रह गया है। अमेरिका का 9/11 , लंदन मेट्रो रेल बम धमाके, फ्रांस में बस चालक द्वारा कुचली गयी भीड़, थाईलैंड में हुए बम विस्फोट, पाकिस्तान में स्कूल पर हुए हमले में मारे गए मासूम बच्चे, यह सूची अंतहीन है। सीरिया जैसे मुल्कों के बारे में तो क्या ही कहा जाए।

अयं निजः वेति गणना लघुचेतसाम।
उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुम्बकम।।

अर्थात यह मेरा बंधु है और वह नहीं, इस प्रकार की तुलना छोटे चित्त वाले व्यक्ति करते हैं। उदार हृदय व्यक्तियों के लिए सम्पूर्ण धरा ही परिवार है। यह सनातन धर्म का मूल संस्कार एवं विचारधारा है। राजनीतिक छींटाकशी में विपक्ष आये दिन,भारत के शीर्ष नेतृत्व पर कायर होने, आक्रामक रवैया न रखने जैसे आरोप लगाता रहता है।उपनिषद में लिखी हुई उपरोक्त पंक्तियों के उद्धरण का अभिप्राय मात्र यह है कि प्राचीन काल से भारतवर्ष की सोच इतनी वृहद रही है। यही कारण है कि हमारा देश अपने लाभ हेतु किसी अन्य देश का अहित नहीं सोच पाता। विडंबना यह है कि जिस संसद में यह आरोप प्रत्यारोप होते हैं उसके प्रवेश द्वार पर भी यही पंक्तियां अंकित हैं।

अर्थात चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी के पूर्वज, इसी मानसिकता का अनुसरण करते आये हैं। किंतु आश्चर्यजनक तथा शर्मसार करने वाली बात है कि जब हमारे देश में पुलवामा जैसा बड़ा आतंकी हमला होता है जिसमे विभिन्न राज्यों के, विभिन्न धर्म और जाति के जवान शहीद हुए जिनका धर्म था देशप्रेम और एक ही इष्ट था ,उनका राष्ट्र। ऐसे दुख की घड़ी में भी निम्नतम स्तर छू लेने को लालायित राजनीतिक बयानबाजी ने कुछ लोगों को यह कहने पर विवश किया कि यह हमला आगामी चुनाव से पहले ही क्यों कर हुआ, इसकी जाँच होनी चाहिए। क्या अर्थ निकाला जाना चाहिए इसका ? क्या कुर्बान होने वाले वीर सैनिकों की चिताओं पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले इन नेताओं के हृदय में लेशमात्र भी देशप्रेम का अंश नहीं बचा है? इस निम्नस्तरीय बयानबाजी से तो ऐसा ही प्रतीत होता है।

स्मरण रहे,जब अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था तब राजनीतिक विरोधाभासों को परे रख पूरा देश और राजनीतिज्ञ आतंकवाद के विरोध में साथ थे और एक दूसरे पर आरोप लगाने के बदले इसका हल निकालने के लिए चिंतित थे। इसी का नतीजा है कि आज तक वहां इस कृत्य की पुनरावृत्ति नहीं हो पायी।

कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उनकी देशभक्ति की भावना से ऊपर हैं। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में धार्मिक उन्माद वाले तत्वों को राजनीतिक शरण देते हैं और उनका इस्तेमाल अपने वोट बैंक के रूप में करते हैं। इस मानसिकता वाले व्यक्तियों की तलाश में आतंकवादी तत्व हमेशा रहते हैं और समय आने पर उनकी आड़ लेकर अपनी कार्यवाही करते हैं। आने वाले दिनों में आतंकवाद से जुड़े लोग इनके काबू से पूरी तरह बाहर हो जाते हैं। आज यह स्थिति देश के कई राज्यों में देखने को मिल रही है और कश्मीर उनमें सर्वोपरि है। सीमांत राज्यों में इस मानसिकता वाले व्यक्तियों का इस्तेमाल पड़ोसी देशों द्वारा किया जाता रहा है।

आतंकवाद धर्म के नाम पर अपनी गतिविधियों को सही साबित करने की कोशिश करता है और धर्मस्थलों को आतंकवादी गतिविधियों को गोपनीय रखने हेतु प्रयोग में लाता रहा है। यद्यपि अलग अलग विचारधारा से जुड़े लोग अलग बातें भी करते हैं किंतु स्वर्ण मंदिर जैसे प्रमुख और पवित्र तीर्थ स्थल पर हुए आपरेशन ब्लूस्टार के जिम्मेदार लोगों और इससे जन्मी भविष्य की घटनाओं के गवाह हम सब रहे हैं। दुख की बात है कि हमने उस घटना से कोई सबक नहीं सीखा और धर्मस्थलों का राजनीतिक इस्तेमाल आज भी जारी है। यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कोई भी धर्म आतंकवाद को सही नहीं ठहराता है।

इससे बहुत करीब से जुड़ा मुद्दा है हमारे देश की जनसंख्या वृद्धि और गरीब, अशिक्षित समाज जिसके युवा बड़ी आसानी से इस रास्ते को अपना रहे हैं। इस आतंकवाद के तथाकथित ठेकेदार इन युवाओं को धर्म के नाम पर सम्मोहित कर उनके दिमाग में गहरी पैठ बना लेते हैं और फिर इस काम में झोंक देते हैं। इन जेहाद और जन्नत के ख्वाब देखने वाले मतवालों ने कभी किसी ने यह क्यों नहीं सोचा कि ये विदेशों में दूर सुरक्षित ठिकानों पर बैठे लोग अपने भाई या बेटों को आत्मघाती हमलावर बनाकर क्यों नहीं भेजते?

एक कमजोर कड़ी है हमारे देश के सुरक्षाकर्मियों पर वी आई पी कल्चर का हावी होना। अमेरिका की ओर एक बार फिर देखिएगा। एक आतंकवादी हमला और उनकी सुरक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए। सबसे बड़ी बात ये रही कि हर नागरिक ने इसे सिर झुका कर स्वीकार किया क्योंकि वो जानते थे कि ये परिवर्तन उनके अपने लाभ हेतु उठाये गए कदम हैं। अब अपने देश की ओर देखें। सुरक्षा कर्मी यदि अपने काम को मुस्तैदी से करना भी चाहें तो भारी भरकम रसूख रखने वाले लोगों को  सुरक्षा जांच अपनी तौहीन लगती है। उनके साथ चलने वाला दल बल उनसे दो हाथ ऊपर ही होता है। हैरानी की बात है कि सुरक्षाकर्मी के जिद पर अड़े रहकर अपना काम करने पर इसके दूरगामी परिणाम उसको ही भुगतने पड़ते हैं। संभवतः यही कारण है कि सुरक्षाकर्मी चाहकर भी अपने काम को ठीक से नहीं कर पाते हैं।

एक उल्लेखनीय पक्ष है हमारे देश की विभिन्न संस्थाओं का पूर्वाग्रह ग्रस्त होना। मीडिया इसमें सबसे ऊपर आता है। जनसंपर्क हेतु क्रांतिकारी रूप से अग्रणी होने का दावा करने वाले सरस्वती रूप मीडिया पर आजकल धनकुबेरों का कब्जा है। मीडिया किसी भी घटना का कौन सा पक्ष उजागर करेगा और कौन सा पर्दे के पीछे रखेगा यह सब पूर्व निर्धारित होता है। इसमें प्रचार के आधुनिक साधन और तकनीक का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। कश्मीर में हालात बद से बदतर होते चले गए किंतु मीडिया ने इस पर कभी क्यों नहीं प्रकाश डाला यह सोचने का विषय है।

इसी सूची में आगे आते हैं वे लोग जो मानवाधिकारों की बात करते हैं। यदि ज़िंदा पकड़े गए आतंकवादियों और उनको शरण देने के लिए सजा काट रहे व्यक्तियों पर होने वाली कार्यवाही में उनके मानवाधिकार के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए तो देश के लिए अपने घर से हजारों मील दूर रेगिस्तान, बर्फीले पहाड़ और समुद्र में दुश्मन का सामना करते जवानों के शहीद होने पर उनके  और उनके परिवारों के हितों के बारे में कौन सोचेगा? आतंकवादियों द्वारा निर्मम हत्या के बाद सोशल मीडिया पर अपना खौफ पैदा करने के लिए भेजे जाने वाले वीडियो, वीर जवानों की शहादत के बाद उनके शवों का अंग भंग किया जाना, इन सब घटनाओं के बाद ये तथाकथिक मानवाधिकार रक्षा के लिए तत्पर संस्थाएं कहाँ होती हैं और इनका क्या योगदान रहता है?

इस सब से तार जुड़े हैं हमारी लचर न्याय प्रणाली के। इसको समझने के लिए आतंकवादी अजमल कसाब से बेहतर उदहारण नहीं हो सकता।एक आतंकी जिसने निरीह जनसमूह को अपनी गोलियों का निशाना बनाया, जिसका कृत्य सी टी वी कैमरों में कैद हुआ, उसको कई वर्षों तक फैसले की प्रतीक्षा में सरकारी मेहमान बनाकर रखा गया। उसकी सुरक्षा पर लाखों रुपये खर्च किये गए और उसको फांसी की सजा दी जाए या नहीं ,इस पर गर्मागर्म बहस छिड़ी। सवाल यह है कि यदि कसाब जैसे आतंकवादी को उसके मानवाधिकार मिलने चाहिए तो मारे गए निर्दोष व्यक्तियों और उनके जीवित परिवारीजन इसके अंतर्गत आते हैं या नहीं?उनके मानवाधिकारों की बात कहां जाकर की जानी चाहिए।

अब बात करते हैं आम नागरिक में बसी देशभक्ति की भावना की। बहुत ही अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारे देश में यह भावना मोहताज होती है आतंकी गतिविधियों में उरी या पुलवामा जैसी घटनाओं में सैनिकों की शहादत की, किसी बस या ट्रेन में विस्फोट की,किसी हवाई जहाज के अपहरण की और तब भी यह कुछ समय ही रहती है।

यह सच है कि सैनिकों का कर्तव्य सीमा और नागरिकों की सुरक्षा है किंतु एक आम नागरिक, जो सैनिक नहीं है, उसने कभी अपने कर्तव्यों के बारे में सोचा है ? हमारे अंदर देशभक्ति की भावना का हर समय जीवित होना अति आवश्यक है। साथ ही स्वयं पर अनुशासन भी होना चाहिए। हम मात्र वहीं अनुशासित होते हैं जहां हमें किसी का भय होता है या हमको कोई देख रहा होता है। यदि राष्ट्रगान को सिनेमाघरों में बजाए जाने का विरोध करने वाले लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देकर मीडिया दिखाता है तो ऐसे में उन सबके अनुसार विकास की सीढ़ी में सबसे नीचे की पायदान पर देशप्रेम को रख देना ही उचित रहेगा शायद।

आतंकवाद राजनीति अथवा धार्मिक उन्माद से जन्म लेता है या प्रेरित होता है किंतु इसकी आग को हवा देने में जो सबसे आगे रहते हैं उनमें पहला नाम है जंग के हथियारों के व्यापारी। यह सोचने की बात है कि यदि खपत नहीं होगी तो उनका व्यापार कैसे चलेगा।उनके फलने फूलने के लिए आवश्यक है कि बंदूकों से लेकर लड़ाकू विमानों तक की मांग दिन दूनी रात चौगुनी बढ़े। इस मांग के बढ़ने के लिए पड़ोसी देशों के बीच तनाव और आतंकवाद जैसे मुद्दे जन्म लेते हैं। दूसरा नाम उन विकसित देशों का है जो विश्व में अपना प्रभुत्व जमाने की होड़ में एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं और अपने आप को सुपर पावर कहते नहीं अघाते।

ये सब अपने स्वार्थ के लिए दूसरे देश रूपी हरे भरे वृक्षों पर आतंकवाद की अमरबेल को रूप देते हैं। इस परजीवी पौधे का तो काम ही है कि जिस पेड़ पर उगे, उसका दाना पानी लेकर उसको कमजोर करे और स्वयं फले फूले। जरा सोचिए ,आतंकवाद जहां भी लंबे समय तक पनपता रहा , वहां की संस्कृति का क्या हुआ। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की शिक्षा का क्या हुआ। अफगानिस्तान, सीरिया के घटनाक्रम याद रखने चाहिए सबको। इसी आग में इस समय कश्मीर भी जल रहा है।

आज भारत विकास के रास्ते पर तेजी से अग्रसर है। धर्म, जाति जैसे फ़िजूल मुद्दों पर अड़े रहना, उनकी आड़ में अपना शक्ति प्रदर्शन करना, इन सब बातों से हमारी गति धीमी होने के अलावा और कुछ सिद्ध नहीं होगा। आज के माहौल में जरूरत है समाज के शिक्षित होने की, जनसंख्या नियंत्रण की,  स्वयं अनुशासित होने की, दिलों में देशभक्ति की भावना को जगाने की और राष्ट्र प्रेम को सर्वोपरि रखने की। संसार का कोई भी धर्म आतंकवाद को बढ़ावा देने का समर्थन नहीं करता।  आवश्यकता है सभी धर्मों को समान आदर देते हुए, भारतीयता की भावना को सर्वोपरि रखा जाये और एकजुट होकर इस आतंकवाद रूपी अमरबेल को समूल नष्ट कर दिया जाए। तभी हम अपने राष्ट्र रूपी वृक्ष की जड़ों को मजबूत करके उसकी विकास रूपी शाखाओं को हरा भरा रख सकते हैं।

दीपा जोशी धवन

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