कब-तक नया भारत झेलता रहेगा 72 साल पुरानी चुनौतियां

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स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई वाली पहली सरकार ने भारत के आधुनिकीकरण के लक्ष्य के रूप में समाज के समाजवादी पैटर्न को स्वीकार किया था। आज 72 साल बाद यह इस सवाल का कोई समुचित उत्तर दे पाने
में समर्थ नहीं है कि  भारत अभी तक इतना गरीब क्यों है? क्या भारत वास्तव में एक स्वतंत्र देश है या ब्रिटिश राज के कानूनों के तहत काम कर रहा है? यह एक समृद्ध राष्ट्र कैसे बन सकता है? भारत ऊर्जा, शहरीकरण, परिवहन और अन्य आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे करेगा?  आधारिक संरचना का आधार कैसा होगा? बदहाल शिक्षा प्रणाली को कैसे ठीक किया जा सकेगा? ग्रामीण विकास के लिए कहां ध्यान केन्द्रित करना चाहिए – ग्रामीण लोगों या ग्रामीण क्षेत्र पर?  क्या सरकार को बड़े पैमाने पर हो रहे सार्वजनिक आर्थिक नुकसान पर भी काम करना चाहिए? बदलाव लाने और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? एक सवाल और मौजूद है कि अतीत की गलतियों को दोहराने से बचने के लिए क्या अब भारत उतनी तत्परता से काम नहीं कर रहा है? इस बात में भी कोई शक नहीं कि भारत साल-दर-साल स्थिर गति से ही सही, आर्थिक रूप से विकसित हो रहा है, लेकिन अफसोस इस बात का भी है कि यह विकास समावेशी नहीं है और भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर है। ज्यादातर भारतीय गुणवत्ता की कमी, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, स्थायी आजीविका और लैंगिक पूर्वाग्रह जैसे मुद्दों से जूझ रहे हैं। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जहां चुनौती होती है वहां अवसर भी होता है। चुनौतियों का सामना करने के लिए कुछ अभिनव समाधान खोजे गए हैं। आधुनिक विचारों और नवाचार द्वारा पुरानी चीजों को चुनौती दी गई है।  देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे रह रही है।

आबादी का एक बड़ा अनुपात ग्रामीण भारत में रहता है। गरीबी का एक प्रमुख कारण ग्रामीणों और समुदायों का उत्पादक संपत्तियों और वित्तीय संसाधनों तक पहुंच का अभाव है। बड़े पैमाने पर निरक्षरता, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा और सामाजिक सेवाओं तक सीमित पहुंच गरीबों में आम है। सहकारी उद्यम हाशिए पर हैं जिसका कोई रखवाला नहीं है। ऐसे में सामाजिक एकीकरण में मुश्किल आना स्वाभाविक है। भारत की प्रमुख समस्या बेरोजगारी है। संयुक्त राष्ट्र की एक श्रम रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 18 करोड़ बेरोजगार लोग हैं। एक लाख भारतीय हर महीने रोजगार की उम्र तक पहुंच जाते हैं। इस समस्या से कैसे निपटा जाए, इसके लिए समुचित उपाय नहीं किए गए हैं। बेरोजगारी से निपटने का यही एक तरीका है कि औद्योगिकीकरण के माध्यम से तेजी से रोजगार के अवसर प्रदान कराए जाएं। ग्रामीण क्षेत्रों में आईटी और बीपीओ कंपनियों की स्थापना की जाए आदि आदि। भारत में शिक्षा का संकट भी भयावह है। हाल ही में संसद में पेश एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 1,00,000 से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है। यह स्थिति सरकार और सभी पक्षों के लिए चिंताजनक है। 76% छात्र उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं। मजेदार तथ्य तो यह है कि माध्यमिक स्कूल में सिर्फ 1% अधिक लड़कियों के दाखिले से हमारी जीडीपी बड़ी आसानी से $ 5.5 मिलियन बढ़ सकती है। भारत में कई प्रमुख मुद्दों की जड़ में शिक्षा की कमी ही है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी चुनौतियों का सामना करते समय अपना विजन कैसा रखते हैं। प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव के समय में इंडिया विजन 2020 का दस्तावेज तैयार किया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने स्वतंत्रता दिवस के एक सम्बोधन में कहा था कि भारत 2020 तक आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र बन जाएगा। राज्यपालों के एक सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने भी घोषणा की थी कि उनकी सरकार राष्ट्रीय विकास के कार्य को आगे बढ़ाएगी।

हमें ध्यान रखना होगा कि कोई भी राष्ट्रीय मिशन किसी पार्टी का एजेंडा नहीं हो सकता है, लेकिन यह मिशन उनके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा हो सकता है। सत्ता में आने पर पार्टी की कार्यपद्धति उसके पूर्ववर्ती से भिन्न हो सकती है, लेकिन दृष्टि सर्वोच्च रखनी होगी। उदाहरण के लिए इंग्लैंड ने दुनिया का पहला समावेशी राजनीतिक संस्थान बनाया। परिणामस्वरूप ब्रिटेन में आर्थिक संस्थान भी अधिक समावेशी होने लगे। संपत्ति के अधिकार को तर्कसंगत बनाकर अंग्रेजों ने बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से सड़कों, नहरों और जलमार्गों और बाद में रेल लाइनों का निर्माण किया। यह सब चीजें औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हुईं। ब्रिटिश सरकार ने आर्थिक संस्थानों का एक समूह भी अपनाया जो निवेश, व्यापार और नवाचारों के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता था। चीन ने भी कुछ ऐसा ही किया। कृषि और उद्योग में बाजार प्रोत्साहन, विदेशी निवेश, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी अपनाकर और विकास का स्वागत करने के बाद चीन ने खुद को तेजी से आर्थिक विकास के मार्ग पर स्थापित कर लिया है। अब समय आ गया है कि हम स्वयं से पूछें कि हमारे राष्ट्र के आर्थिक विकास में क्या बाधाएं हैं? भारत के संस्थान लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संसद और राजनीतिक दलों पर आधारित हैं। विचार करने का एक प्रश्न यह भी है कि क्या इन राजनीतिक संस्थानों ने ऐसे संस्थानों का निर्माण किया है जो आर्थिक समावेशी हों।  इसका जवाब हमें ‘नहीं’ के रूप में मिलता है। दुखद है कि भारत की आर्थिक वृद्धि टिकाऊ नहीं हो पा रही है।


महान विचारक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के शब्दों में- भारत एक ऐसा राष्ट्र बने जो दुनिया भर के सबसे प्रतिभाशाली विद्वानों, वैज्ञानिकों और निवेशकों के लिए सबसे अच्छा गंतव्य स्थल हो, एक ऐसा राष्ट्र बने जहां का शासन उत्तरदायी, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो, जहां गरीबी पूरी तरह से समाप्त हो गई है, अशिक्षा खत्म हो गई हो, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ कोई अपराध नहीं होते हों, और समाज में कोई भी खुद को अलग-थलग महसूस नहीं करता हो। एक ऐसा देश हो  जो समृद्ध, सुरक्षित, आतंकवाद से रहित, शांतिपूर्ण और खुशहाल हो और सतत विकास के पथ पर आगे बढ़ता रहे। यह ऐसा राष्ट्र बने जहां के लोग अपने नेतृत्व पर गर्व करते हों।

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