असम के नगांव ज़िले में पिछले कुछ हफ्तों से बुलडोज़र की आवाज़ें इस वक्त पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खीचने का काम कर रही है लेकिन हमेशा की तरह ये शोर दबाया जा रहा है। दरअसल, असम में अडानी प्रोजेक्ट (Assam Adani power project) के तहत 2000 से ज्यादा परिवारों को उजाड़ा जा रहा है।
वहीं दूसरी सरकार इसे ‘खास जमीन’ (Khas Land) बताकर खाली करा रही है, लेकिन यहां रहने वाले 10,000 से ज्यादा मियां मुसलमान, दशकों से यही अपना घर मानते आए हैं। अब असल सवाल ये है: क्या यह मामला सिर्फ ज़मीन का है? या इसके पीछे है पहचान, राजनीतिक प्राथमिकता और कॉरपोरेट्स का बढ़ता दबदबा?
क्या है पूरा मामला
वॉयर की रिपोर्ट के मुताबिक, 8 जुलाई को असम के धुबरी ज़िले में प्रशासन ने एक बड़ा बुलडोज़र अभियान चलाया। बिलासीपाड़ा क्षेत्र के चार गांवों चिराकुटा, संतोषपुर, चरुआबखरा जंगल ब्लॉक, और चिराकुटा पार्ट 1 और 2 में 2,000 से ज़्यादा मकान तोड़ दिए गए। ये सब उस ज़मीन पर बसे थे जहां राज्य सरकार अब 3,400 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने जा रही है।
सरकार इसे ‘खास जमीन’ (Khas Land) बताकर खाली करा रही है। मतलब- ये जमीन सरकार के अधीन होती है, लेकिन सरकार ने उसे किसी संस्था या व्यक्ति को अलॉट नहीं किया होता है। जिसे अडानी समूह के प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट के लिए सरकार ने अधिग्रहित किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पावर प्रोजेक्ट की शुरुआत कोकराझार ज़िले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में होनी थी, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते इसे धुबरी के मुस्लिम बहुल इलाके में शिफ्ट कर दिया गया। यह बदलाव अब सामाजिक और राजनीतिक सवालों को जन्म दे रहा है।
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चार दिन में नोटिस, फिर तोड़फोड़
धुबरी प्रशासन ने 4 जुलाई को सार्वजनिक घोषणा की और 5 जुलाई को चरुआबखरा जंगल ब्लॉक, चिराकुटा पार्ट-1, पार्ट-2 और संतोषपुर जैसे गांवों में नोटिस लगाए। 8 जुलाई को बड़ी संख्या में पुलिस बल और बुलडोज़रों के साथ कार्रवाई शुरू कर दी गई। 3,000 से अधिक पुलिसकर्मी और 100 से ज्यादा बुलडोज़र इस अभियान में तैनात थे।

प्रभावितों को मिला ₹50,000 का मुआवज़ा, पुनर्वास पर असमंजस
प्रशासन ने “Assam Land and Revenue Regulation, 1886” कानून के तहत नोटिस जारी किया और उसे वैध माना। प्रशासन ने दावा किया है कि हर बेदखल परिवार को ₹50,000 की एकमुश्त राहत राशि दी जाएगी, और उन्हें धुबरी ज़िले के बायज़र अलगा गांव में पुनर्वासित किया जाएगा।
हालांकि, जिस जगह पुनर्वास की बात हो रही है ‘बायज़र अलगा’ वह ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़-प्रवण (flood-prone) क्षेत्र में आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह इलाका हर साल बाढ़ की चपेट में आता है, और वहाँ स्थायी रूप से बसना न तो सुरक्षित है, न ही व्यावहारिक। इस वजह से मुआवज़ा और पुनर्वास की सरकारी योजना को न केवल अपर्याप्त, बल्कि जोखिम भरी और असंवेदनशील भी बताया जा रहा है। 52 वर्षीय अजीरन नेसा, जिनका घर इस कार्रवाई में उजड़ गया, कहती हैं, “सिर्फ 50,000 रुपये में हम कहां जाएंगे? वहां कोई स्कूल नहीं, कोई सड़क नहीं। क्या हम पानी में घर बसाएं?”

असम सरकार की एक महीने में चौथी बड़ी बेदखली कार्रवाई
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पिछले महीने इन स्थलों का दौरा किया था और घोषणा की थी कि यह ज़मीन एक प्रस्तावित 3,200 मेगावॉट के थर्मल पावर प्लांट के लिए चिन्हित की गई है। इस परियोजना के लिए राज्य सरकार की अडानी समूह के साथ बातचीत चल रही है। इस साल अप्रैल में सरमा ने गुवाहाटी में जीत अडानी से मुलाकात की थी ताकि असम में “अडानी के प्रमुख प्रोजेक्ट्स को अंतिम रूप दिया जा सके”, जिसमें यह थर्मल पावर प्लांट भी शामिल है।
पिछले एक महीने में असम सरकार द्वारा यह चौथी बार बड़े पैमाने पर बेदखली की कार्रवाई की गई है। इससे पहले गोलपारा, नलबाड़ी और लखीमपुर जिलों में भी इसी तरह की कार्रवाइयां हुई थीं। कुल मिलाकर अब तक 2,300 से अधिक परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है।

भारत में अडानी समूह के ज़मीन विवाद
| राज्य | स्थान / परियोजना | विवाद का प्रकार | साल / स्थिति |
|---|---|---|---|
| गुजरात | मुंद्रा पोर्ट और SEZ | ग्रामीणों ने खेती की ज़मीन जबरन अधिग्रहण का आरोप लगाया, पर्यावरणीय नुकसान का मामला | 2005-2013, NGT और स्थानीय विरोध |
| छत्तीसगढ़ | गोंड जनजातीय इलाका (तमनार) | आदिवासियों की ज़मीन पर अधिग्रहण का आरोप, वनाधिकार अधिनियम के उल्लंघन की शिकायत | 2014 से लगातार विरोध |
| झारखंड | गोड्डा (पावर प्लांट) | किसानों ने जबरन ज़मीन अधिग्रहण का आरोप लगाया, कंपनसेशन विवाद | 2015 से केस और आंदोलन |
| महाराष्ट्र | रायगढ़ (SEZ परियोजना) | ग्रामीणों की ज़मीन 2005 में ली गई, 2019 में कोर्ट ने अधिग्रहण रद्द किया | बॉम्बे HC का ऐतिहासिक फैसला 2019 |
| ओडिशा | धामरा पोर्ट परियोजना | मछुआरों और स्थानीय समुदायों द्वारा विरोध, पर्यावरणीय खतरे की शिकायत | 2008-2015 तक प्रदर्शन |
| तमिलनाडु | कुडनकुलम के पास प्रस्तावित प्रोजेक्ट | भूमि अधिग्रहण का विरोध, पुनर्वास योजना पर सवाल | 2018 के बाद ठप प्रोजेक्ट |
| केरल | विजिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट | तटीय समुदायों ने विस्थापन और पर्यावरणीय खतरे का मुद्दा उठाया | 2022 में व्यापक प्रदर्शन |
| असम | धुबरी (थर्मल पावर प्लांट) | खास ज़मीन पर बसे 10,000 से अधिक मियां मुस्लिम विस्थापित, पुनर्वास पर सवाल | जुलाई 2025 में बड़े पैमाने पर विरोध |
नोट: ये केस पब्लिक डोमेन में है, जैसे- (राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अख़बारों की रिपोर्टिंग, कोर्ट केस आदि)

विरोध के बावजूद अडानी समूह ने साधी चुप्पी
अडानी समूह ने अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। यह पहली बार नहीं है जब अडानी प्रोजेक्ट्स को लेकर ज़मीन अधिग्रहण या विस्थापन को लेकर विवाद हुआ हो। इससे पहले झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी स्थानीय विरोध और सामाजिक विस्थापन जैसे मुद्दे उठ चुके हैं।
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वामपंथी नेताओं ने क्या कहा?
वॉयर के मुताबिक, CPI(M) नेता सुप्रकाश तालुकदार ने भी इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और कहा कि सरकार कॉर्पोरेट एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, जिसमें अल्पसंख्यकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। “ये सिर्फ ज़मीन खाली कराना नहीं है, ये ज़मीन और संसाधनों को कॉर्पोरेट हाथों में सौंपने की बड़ी योजना है। बीजेपी इसे ‘असम को मिया मुस्लिमों से बचाने’ जैसा प्रचारित कर रही है, ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से चुनावी लाभ लिया जा सके।”
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