50 Years Of Emergency: आपातकाल के 50 साल: क्या लोकतंत्र अब भी डरा हुआ है?

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आज 1975 के आपातकाल की घोषणा (50 Years Of Emergency) को 50 वर्ष पूरे हो गए। यह वही दिन था, जब भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर पहली बार औपचारिक रूप से असाधारण अंकुश लगाया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित यह आपातकाल, भारतीय गणराज्य के संवैधानिक मूल्यों की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा थी।

25 जून 1975: रातों-रात बदल गया भारत
1975 की गर्मियों में देश राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। जेपी आंदोलन के नेतृत्व में छात्रों और विपक्षी दलों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक अराजकता के खिलाफ nationwide आंदोलन छेड़ रखा था। इस बीच, 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में अनियमितता का दोषी ठहराते हुए उनका लोकसभा चुनाव रद्द कर दिया।

राजनीतिक दबाव और न्यायिक झटका

इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे का दबाव बढ़ा। विपक्ष ने उन्हें संवैधानिक मर्यादा का पालन करने की चुनौती दी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इसे राजनीतिक अस्तित्व पर संकट माना। नतीजतन, इंदिरा गांधी ने इसे “आंतरिक अशांति” करार दिया और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगाने की सिफारिश की।

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25 जून 1975 लोकतंत्र पर लगाम: क्या-क्या हुआ

  • मूल अधिकारों का निलंबन: नागरिकों के भाषण, अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता जैसे अधिकार निलंबित कर दिए गए।

  • मीडिया सेंसरशिप: अखबारों को बिना सरकारी अनुमति कुछ भी छापने की इजाजत नहीं थी।

  • नेताओं की गिरफ्तारी: जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई जैसे कई विपक्षी नेताओं को बिना सुनवाई जेल भेजा गया।

  • नसबंदी और प्रशासनिक दमन: संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर जनसंख्या नियंत्रण अभियान चलाया गया, जिसमें व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे।

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जनता का जवाब: लोकतंत्र ने पलटवार किया
आपातकाल के 21 महीने बाद, 18 जनवरी 1977 को अचानक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आम चुनाव कराने की घोषणा कर दी। यह फैसला जितना अप्रत्याशित था, उतना ही निर्णायक भी — क्योंकि पहली बार जनता को यह अवसर मिला था कि वह आपातकाल के दौरान हुए शासन, दमन और नागरिक अधिकारों के हनन पर अपनी राय जाहिर कर सके।

आपातकाल के दौरान गिरफ्तार विपक्षी नेता जैसे जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर जब रिहा हुए, तो उन्होंने जनता पार्टी के नाम से एक साझा मंच तैयार किया।
उनका नारा था: “लोकतंत्र बनाम तानाशाही”।

देशभर में यह भावना फैल चुकी थी कि कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना ही लोकतंत्र की रक्षा का एकमात्र रास्ता है। नतीजतन, गांव से शहर तक यह चुनाव सिर्फ सरकार बदलने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बहाली का आंदोलन बन गया। मार्च 1977 में हुए आम चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले थे। जनता पार्टी को 295 सीटें मिलीं, और वह बहुमत में आ गई। मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

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पचास साल बाद: क्या हमने कुछ सीखा है?
25 जून 1975 को लागू हुआ आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठोर परीक्षा थी। उस दौर में शासन की आलोचना अपराध बन गई थी, संस्थानों को सरकार के अधीन कर दिया गया था, और नागरिक स्वतंत्रता — जो संविधान का मूल आधार है — उसे दबा दिया गया था। लेकिन सवाल यह है: आज, 50 वर्ष बाद, क्या भारत ने उस दौर से कुछ सीखा है?

1. संस्थाओं की स्वतंत्रता अब भी चुनौती में है
आपातकाल के समय न्यायपालिका, प्रेस, और ब्यूरोक्रेसी को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। आज भले ही वैधानिक रूप से ऐसी स्थितियां न हों, लेकिन संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल उठाना आम हो गया है।

  • क्या आज मीडिया निष्पक्ष है?

  • क्या न्यायपालिका पर कोई परोक्ष दबाव नहीं है?

  • क्या चुनावी संस्थाएं पूरी तरह स्वतंत्र हैं?

वर्तमान दौर में यह कहा जाता है कि नियंत्रण अब सीधे नहीं, प्रभाव और भय के ज़रिए होता है — जिसे कुछ विश्लेषक “सॉफ्ट इमरजेंसी” की संज्ञा देते हैं।

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2. मीडिया की भूमिका: तब बंद था, अब बंधा हुआ है?
1975 में प्रेस सेंसरशिप लागू हुई थी। आज भले ही कोई औपचारिक सेंसरशिप न हो, लेकिन खबरों के चयन, प्राथमिकता और प्रस्तुति में स्पष्ट झुकाव देखा जाता है।

  • कई बड़े मीडिया संस्थान सत्ता समर्थक लाइन पर चलते हैं।

  • स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाले संस्थान सीमित संसाधनों और दबावों से जूझ रहे हैं।

  • सोशल मीडिया पर सेंसरशिप और मनमानी रिपोर्टिंग नए खतरे बनकर उभरे हैं।

3. नागरिकों की भूमिका: जागरूकता बढ़ी है, लेकिन सक्रियता कम
आपातकाल ने यह सिखाया था कि नागरिकों की चुप्पी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी है। 1977 में जनता ने मतदान के ज़रिए संदेश दिया था कि वह सब कुछ सहन नहीं करेगी। आज का नागरिक अधिक शिक्षित, अधिक जुड़ा हुआ है — लेकिन क्या वह उतना ही सक्रिय और जवाबदेह है?

  • क्या हम नेताओं से जवाब मांगते हैं?

  • क्या हम नीतियों की गहराई से समीक्षा करते हैं या सिर्फ नारे और छवियों पर भरोसा करते हैं?

4. लोकतंत्र की परिभाषा: सिर्फ चुनाव नहीं, संवाद भी
आपातकाल का सबसे बड़ा सबक यही था कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि संवाद, असहमति और आलोचना की संस्कृति है। यदि कोई सरकार असहमति को दबाती है या हर विरोध को राष्ट्रविरोध कहकर खारिज करती है — तो यह उसी प्रवृत्ति का रूप है, जिसने 1975 में आपातकाल को जन्म दिया था।

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