बिहार के भोजपुर जिले (Bihar News) से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। आरा के मौलाबाग स्थित एसबी स्कूल के प्रधानाध्यापक और बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) सुपरवाइजर 59 साल के राजेंद्र प्रसाद की 27 अगस्त को कार्डियक अरेस्ट से मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के काम का दबाव और अधिकारियों की लगातार डांट-फटकार उनकी मौत की वजह बनी। राजेंद्र प्रसाद सिर्फ चार महीने बाद यानी 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले थे।
परिवार का आरोप: काम के दबाव ने बिगाड़ी सेहत
राजेंद्र प्रसाद के बेटे आशीष राज ने बताया कि लगातार ऊपर से फोन आते थे। कहा जाता था कि ऑफिस आकर सफाई दो, वरना कार्रवाई होगी। इसी तनाव के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई। आशीष ने बताया कि उन्हें पटना के IGIMS अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहाँ भीड़ थी, जिसके बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहीं उनकी जान चली गई।

बड़ी बेटी दीपशिखा ने कहा, “एक बार पापा को फोन आया कि पाँच मिनट में ऑफिस नहीं पहुँचे तो बर्खास्त कर दिए जाएंगे। इस कॉल के बाद पापा बहुत डर गए और चुप रहने लगे।” पत्नी अनारकली का कहना है कि एसआईआर का काम शुरू होने के बाद से वे अक्सर चिड़चिड़े हो गए थे। पहले ऐसा कभी नहीं था।
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बीएलओ बोले: असहनीय है दबाव
द वॉयर के मुताबिक, भोजपुर और आसपास जिलों के कई बीएलओ ने माना कि इस बार मतदाता सूची के काम का दबाव बहुत ज्यादा है। अचानक मीटिंग बुला ली जाती है, चाहे बारिश हो या बाढ़, समय पर पहुँचना पड़ता है। नहीं पहुँचे तो डांट सुननी पड़ती है। एक बीएलओ ने कहा, “घर वाले भी ताना देते हैं कि ऐसी नौकरी का क्या फायदा, जिसमें परिवार के लिए वक्त ही नहीं है।”
सारण जिले के सोनपुर प्रखंड के बीएलओ सनोज कुमार ने बताया कि “बाढ़ के बीच भी काम करना पड़ा। ऊपर से अधिकारियों का दबाव अलग। तनाव इतना था कि परिवार भी परेशान हो गया।”
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बड़ा सवाल: कब बदलेगा सिस्टम?
राजेंद्र प्रसाद की मौत ने सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षक जैसे सम्मानजनक पद पर काम करने वाले लोग भी अधिकारियों की डांट-फटकार और असहनीय दबाव का शिकार हो रहे हैं। मतदाता सूची सुधारने का काम जरूरी है, लेकिन क्या इसके लिए कर्मचारियों की जान जोखिम में डालना सही है?
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि इस पूरी व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है। जब तक बीएलओ और शिक्षकों को सुरक्षित माहौल और इंसानियत से काम करने का मौका नहीं मिलेगा, ऐसी घटनाएँ दोहराई जाती रहेंगी।
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