न्याय की घड़ी रुकी या सिस्टम थक गया? देश की अदालतों में 5 करोड़ केस पेंडिंग, देखिए VIDEO

50 साल से अधिक समय से लंबित 2 हज़ार एक सौ पचासी केसेज़ केवल कोलकाता हाईकोर्ट में हैं। वहीं 40-50 साल पुराने करीब 23 हज़ार, 30-40 साल पुराने 63 हज़ार और 20-30 साल पुराने 3 लाख 40 हज़ार मामलों का भी बोझ कोर्टों पर पड़ा हुआ है।

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देश की अदालतों (Pending Case India )में न्याय की धीमी रफ्तार अब शर्मनाक रिकॉर्ड बन चुकी है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर की अदालतों में कुल मिलाकर लगभग 5 करोड़ आठ लाख केस लंबित हैं। वह बोझ जो लगातार बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में ही इस समय 88 हज़ार 417 मामले पेंडिंग हैं, जबकि हर महीने दाखिल होने वाले नए मामलों की संख्या निपटाए जा रहे मामलों से अधिक है।

हाईकोर्ट्स की बात करें तो पुरानी फाइलें चिंता बढ़ाती हैं। 50 साल से अधिक समय से लंबित 2 हज़ार एक सौ पचासी केसेज़ केवल कोलकाता हाईकोर्ट में हैं। वहीं 40-50 साल पुराने करीब 23 हज़ार, 30-40 साल पुराने 63 हज़ार और 20-30 साल पुराने 3 लाख 40 हज़ार मामलों का भी बोझ कोर्टों पर पड़ा हुआ है। ये सिर्फ संख्याएँ नहीं, बल्कि उन पीड़ितों की ज़िंदगियाँ हैं जिनकी आवाज़ अदालतों की धीमी मशीनरी में दब कर रह गई।

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कानून मंत्रलय ने देरी की वजहों में जजों की कमी, वकीलों की अनुपस्थिति, पुलिस जांचों में ढीलापन, गवाहों के मुकर जाने और फाइलों के समय पर न मिलने जैसे कारकों को बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ़ संख्या बढ़ने से परे, कार्यप्रणाली में सुधार, डिजिटल अडॉप्शन और सशक्त जजीयल बेंचिंग जैसी ठोस योजनाएँ चाहिएं।

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वहीं आम नागरिक असमंजस में है जब रेप और मर्डर जैसे गंभीर मामलों में पीड़िताएं उम्र काटें, गवाह मर जाएँ और अपराधी बिन सज़ा घूमें, तो न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कैसे टिका रहेगा? समय रहते सुधार न हुए तो न्याय का अधिकार सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाएगा और असल इंसाफ़ आम आदमी के लिए एक दूर की आशा बन कर रह जाएगा।

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