भोपाल: मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में कुपोषण की चिंताजनक स्थिति पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर सभी जिलों से कुपोषण संबंधी आंकड़े जुटाकर अदालत में पेश करे। अदालत ने यह आदेश एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार ज़मीनी हकीकत छिपा रही है और पोषण योजनाएं कागज़ों तक ही सीमित हैं।
क्या कहा अदालत ने?
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी जानकारी को छिपाया नहीं जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि वह हर जिले के कलेक्टर से रिपोर्ट मंगाकर यह बताए कि:
- कितने बच्चे कुपोषित हैं?
- उनमें से कितने गंभीर रूप से कुपोषित हैं?
- पोषण केंद्र कितने सक्रिय हैं?
- वहां कितने कर्मचारी कार्यरत हैं?
- क्या केंद्रों में नियमित सेवाएं दी जा रही हैं?
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याचिका में क्या दावा किया गया?
यह आदेश जबलपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता दीपंकर सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। जनहित याचिका में कहा गया है कि मध्यप्रदेश में 0 से 6 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों में करीब 10 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जिनमें से 1.36 लाख बच्चे गंभीर श्रेणी में आते हैं। साथ ही, राज्य की करीब 57% महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं।
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याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि सरकारी पोर्टल Poshan Tracker 2.0 और NFHS (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) जैसे स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। साथ ही ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे कई आंगनवाड़ी केंद्रों में उपस्थिति नहीं होती, और योजनाएं लागू नहीं हो पा रही हैं।
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याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में आंगनवाड़ी केंद्र नाममात्र पर चल रहे हैं और कई में तो सेवाएं महीनों से बंद हैं। इसके बावजूद, केंद्र और राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत की जा रही रिपोर्टें पूरी तरह संतोषजनक नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि 4 हफ्तों के भीतर एक विस्तृत और सत्यापित रिपोर्ट दाखिल करें। अगली सुनवाई अगस्त के अंत में संभावित है, जिसमें अदालत रिपोर्ट की समीक्षा करेगी और अगली कार्रवाई तय की जाएगी।
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