सरकार ने माना सीवर सफाई में जान गंवाने वाले 90% मजदूरों के पास कोई सेफ्टी गियर नहीं

इन भयावह आंकड़ों के बीच जब लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे ने सवाल उठाया, तो सामाजिक न्याय मंत्रालय ने जवाब में कहा कि सरकार ने जुलाई 2023 में "नमस्ते योजना" शुरू की है।

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भारत में सीवर के भीतर उतरने वाले मजदूर सिर्फ नालियों की गंदगी नहीं, बल्कि व्यवस्था की बेरुखी को भी अपने सिर पर ढोते हैं। हाल ही में सरकार द्वारा कराए गए एक ऑडिट ने यह कठोर तथ्य सामने रखा है कि सीवर में मरने वाले लगभग हर 10 में से 9 मजदूरों के पास कोई सुरक्षा उपकरण जैसे ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, सेफ्टी बेल्ट या बूट आदि नहीं था। यह आंकड़ा अकेले उनकी मौत का नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं का भी पोस्टमार्टम है जो दशकों से इस श्रम को अनदेखा और अवमूल्यित करती आई हैं।

हाल ही में संसद में पेश एक सरकारी ऑडिट रिपोर्ट ने इस गंभीर समस्या की जड़ों को सामने रखा है। 2022 और 2023 में देशभर में 150 लोग सीवर (Sewer Deaths) और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई करते हुए मारे गए, जिनमें से 54 मामलों का गहराई से विश्लेषण किया गया।

यह अध्ययन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सितंबर 2023 में शुरू किया था। इसके तहत 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 17 जिलों में हुई मौतों की जांच की गई और 22 जुलाई 2025 को संसद में इसके नतीजे रखे गए।

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मौत से पहले न कोई उपकरण, न प्रशिक्षण- रिपोर्ट में पाया गया कि जिन 54 मज़दूरों की मौत हुई, उनमें से:

  • 49 मज़दूरों ने कोई भी सुरक्षा उपकरण नहीं पहना था
  • 5 मज़दूरों के पास सिर्फ़ दस्ताने थे
  • सिर्फ 1 मज़दूर के पास दस्ताने और बूट दोनों थे
  • 47 मामलों में मशीन या अन्य उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए थे
  • केवल 1 मामले में उचित प्रशिक्षण दिया गया था

यानी ज़्यादातर मज़दूर बिना किसी तैयारी, बिना सुरक्षा और बिना जानकारी के सीवर में उतारे गए।

इन भयावह आंकड़ों के बीच जब लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे ने सवाल उठाया, तो सामाजिक न्याय मंत्रालय ने जवाब में कहा कि सरकार ने जुलाई 2023 में “नमस्ते योजना” शुरू की है। इसका उद्देश्य है- सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई में लगे कर्मियों और कचरा बीनने वालों की पहचान, सुरक्षा और पुनर्वास। हालांकि ऑडिट से साफ है कि योजना की घोषणाएं ज़मीनी हकीकत में तब्दील नहीं हो पाईं। अधिकतर नगर निकायों में न मशीनें हैं, न बजट, और न ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति।

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नियम तोड़े गए, फिर भी कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं
भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर 1993 में प्रतिबंध लगा दिया गया था और 2013 में इसे लेकर एक सख्त कानून बना। इसके तहत सीवर के अंदर भेजने के लिए 27 नियमों का पालन अनिवार्य है। जिनमें सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण, ऑक्सीजन सपोर्ट, इमरजेंसी टीम आदि शामिल हैं। लेकिन इस ऑडिट से साफ है कि ये नियम ज्यादातर मामलों में सिर्फ़ कागज़ पर ही मौजूद रहे।

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सरकारी ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 27 मामलों में श्रमिकों से कोई सहमति नहीं ली गई। साथ ही, जिन 18 मामलों में श्रमिकों से लिखित सहमति ली गई थी, उनमें भी उन्हें काम में शामिल जोखिमों के बारे में परामर्श नहीं दिया गया था। रिपोर्ट में पाया गया कि 38 मामलों में मज़दूरों को ‘व्यक्तिगत रूप से/व्यक्तिगत रूप से अनुबंधित’ किया गया था। पांच मामलों में मज़दूर सरकारी एजेंसी में कार्यरत थे और तीन मामलों में वे सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत थे, लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई, तब उन्हें निजी नियोक्ताओं द्वारा उस विशेष कार्य के लिए काम पर रखा गया था, जिसे वे कर रहे थे।

मरने के बाद ही जागे सिस्टम
रिपोर्ट में बताया गया कि 54 मौतों में से सिर्फ 7 मामलों में जागरूकता अभियान चलाए गए, वो भी अधूरे और सीमित स्तर पर। ये अभियान सिर्फ़ चेन्नई, कांचीपुरम (तमिलनाडु) और सतारा (महाराष्ट्र) में देखे गए। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि 45 मामलों में स्थानीय एजेंसियों के पास कोई तैयार उपकरण या प्रक्रिया तक नहीं थी। यानी मौतें अचानक नहीं हुईं, बल्कि पूरी तरह लापरवाही और गैर-जवाबदेही का नतीजा थीं।

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