भारत में जब पति-पत्नी के रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं और साथ रहना संभव नहीं होता, तो तलाक (Divorce In India) का रास्ता अपनाया जाता है। हालांकि, तलाक की प्रक्रिया हर मामले में एक जैसी नहीं होती। अलग-अलग धर्मों, स्थितियों और आपसी सहमति के आधार पर इसके तरीके और कानूनी प्रावधान भी अलग हैं।
कानून के तहत तलाक मुख्य रूप से दो तरह से लिया जा सकता है- आपसी सहमति से और एकतरफा यानी विवादित तलाक के रूप में। इसके अलावा मुस्लिम पर्सनल लॉ, हिंदू मैरिज एक्ट और स्पेशल मैरिज एक्ट जैसे विभिन्न कानून तलाक की प्रक्रिया तय करते हैं। चलिए आज इस आर्टिकल में तलाक की पूरी प्रक्रिया के बारें में विस्तार से जानते हैं।
जब दोनों तैयार हों तो होता है ‘आपसी सहमति से तलाक’ (Mutual Divorce)
आपसी सहमति से तलाक में दोनों पक्ष इस बात पर सहमत होते हैं कि अब साथ रहना संभव नहीं। ऐसे में वे फैमिली कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल करते हैं। कानूनी प्रावधान के मुताबिक, इस याचिका के बाद कोर्ट दोनों को 6 महीने का समय देता है, जिसे ‘कूलिंग पीरियड’ कहा जाता है। इस अवधि में अगर दोनों दोबारा साथ रहने का फैसला करते हैं तो मामला वापस लिया जा सकता है। अन्यथा, कोर्ट तलाक को मंजूरी दे देता है।
एक पक्ष राज़ी न हो तो होता है ‘विवादित तलाक’ (Contested Divorce)
जब किसी एक पक्ष को तलाक चाहिए लेकिन दूसरा इसके लिए तैयार न हो, तो मामला विवादित यानी ‘कॉन्टेस्टेड डिवोर्स’ बन जाता है। इसमें कोर्ट के समक्ष कई कानूनी आधार (ग्राउंड्स) दिए जाते हैं। जैसे मानसिक या शारीरिक क्रूरता, विवाहेत्तर संबंध, पति-पत्नी का लापता होना, धर्म परिवर्तन, मानसिक विकार, या शारीरिक अक्षमता। कोर्ट इस पर गवाहों और दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर फैसला करता है।
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मुस्लिम कानून में अलग-अलग प्रकार से होता है तलाक (Muslim Divorce)
मुस्लिम समुदाय में तलाक के लिए शरीयत कानून के तहत विभिन्न प्रकार हैं। इनमें तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन को मान्यता प्राप्त है। हालांकि तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक एक साथ) को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक घोषित कर चुका है और अब यह आपराधिक अपराध है। महिलाएं भी खुला के माध्यम से तलाक मांग सकती हैं, जिसमें वह पति से विवाह समाप्त करने की इजाजत चाहती हैं। इसके अलावा, अदालत के माध्यम से ‘फस्ख’ के तहत भी तलाक संभव है, यदि पति तलाक देने को तैयार न हो।

जब धर्म की सीमाएं न हों: स्पेशल मैरिज एक्ट
यदि पति-पत्नी का विवाह अंतर-धार्मिक या विशेष परिस्थिति में हुआ है, तो तलाक स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत होता है। इसमें दोनों पक्षों के लिए आपसी सहमति और विवादित दोनों प्रकार की प्रक्रिया उपलब्ध होती है। यह एक्ट धर्मनिरपेक्ष है और इसमें विवाह और तलाक के लिए समान प्रक्रिया लागू होती है।
हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक के आधार (Divorce Under Hindu Marriage Act)
हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन समुदाय के लिए तलाक की प्रक्रिया हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत होती है। इसमें तलाक के लिए क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार, मानसिक विकार, या एक पक्ष का संन्यासी बन जाना जैसे आधार तय किए गए हैं। इसके अलावा, अगर पति या पत्नी 7 साल से अधिक समय से लापता हो तो भी तलाक की अर्जी दी जा सकती है।
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बच्चों की कस्टडी और भरण-पोषण की जिम्मेदारी (Child custody after divorce in India)
तलाक के मामलों में अदालत बच्चों की देखभाल और भरण-पोषण के बारे में भी फैसला देती है। यह तय करने में कोर्ट इस बात का ध्यान रखती है कि बच्चे के भविष्य और पालन-पोषण के लिए कौन-सा पक्ष उपयुक्त होगा। मेंटेनेंस यानी गुजारा भत्ता तय करने में पति या पत्नी की आमदनी और जीवनशैली का भी मूल्यांकन किया जाता है।
तलाक का फॉर्म कहां मिलेगा?
तलाक की याचिका दाखिल करने के लिए आवश्यक फॉर्म संबंधित जिले की फैमिली कोर्ट या जिला कोर्ट से प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, कई राज्य और जिला अदालतों की आधिकारिक वेबसाइटों (जैसे ecourts.gov.in) पर भी तलाक याचिका के फॉर्म PDF प्रारूप में उपलब्ध होते हैं, जिन्हें डाउनलोड करके भरना संभव है।
अगर कोई व्यक्ति स्वयं याचिका दाखिल करना चाहता है, तो उसे कोर्ट से मान्यता प्राप्त फॉर्मेट में याचिका तैयार करनी होती है, हालांकि ज़्यादातर मामलों में वकील खुद याचिका का प्रारूप तैयार करते हैं, जो केस की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
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तलाक की प्रक्रिया: कोर्ट में कैसे आगे बढ़ता है मामला (How to file divorce in India)
1. चाहे मामला आपसी सहमति का हो या विवादित – तलाक की प्रक्रिया तय चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले याचिका दाखिल की जाती है, जिसमें विवाह प्रमाण-पत्र, पहचान पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज शामिल होते हैं।
2. इसके बाद कोर्ट दूसरे पक्ष को नोटिस जारी करता है। यदि मामला विवादित है, तो दोनों पक्षों की सुनवाई होती है और गवाह पेश किए जाते हैं। कोर्ट स्थिति को देखते हुए सलाह-मशविरा या मध्यस्थता (Counseling/Mediation) की सिफारिश भी कर सकता है।
3. आपसी सहमति वाले मामलों में दोनों पक्ष सैटलमेंट एग्रीमेंट बनाते हैं, जिसमें बच्चे की देखभाल, संपत्ति का बंटवारा और गुज़ारा भत्ता जैसी शर्तें होती हैं। कोर्ट इसे जांचने के बाद अंतिम सुनवाई करता है।
अंतिम सुनवाई और डिक्री के बाद क्या होता है
कोर्ट जब यह सुनिश्चित कर लेता है कि दोनों पक्षों की सहमति है या विवादित मामले में कानून के तहत तलाक जरूरी है, तो फाइनल डिक्री (अंतिम आदेश) जारी करता है। इसके साथ ही विवाह कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है। इसके बाद दोनों पक्षों को डिक्री की शर्तों का पालन करना होता है – चाहे वह संपत्ति का ट्रांसफर हो, बच्चों की कस्टडी हो या गुज़ारा भत्ता देना हो।
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