भारत अपने लोगों को श्रृंखला में बांधता है। आज की तारीख में आरक्षण एक एेसा मुद्दा है जो हरेक शिक्षित युवक और युवती की जुबान पर है। इन युवाअों का आक्रोश इस बात पर है कि उनसे काफी अंक लाने वाले लोगों का चयन सरकारी नौकरियों में हो जा रहा है और वे ज्यादा शिक्षित होने के बाद भी दर-दर की ठोंकरे खाने को मजबूर होते हैं। सवाल है कि आरक्षण क्या है? सीधे शब्दों में कहा जाए तो विशेष रूप से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण एक उपकरण है जिससे उन्हें दूसरों के समान होने में मदद दी जानी है। समानता के लिए आरक्षण को महत्वपूर्ण माना जाता है। कोई शक नहीं कि आरक्षण समाज के ऊपरी और निचले वर्गों के बीच के अंतर को दूर करने के लिए था। लेकिन इस मुद्दे को एक अर्थ में समझने की आवश्यकता है। न्याय प्रदान करने का काम सभी के बीच खुशी को बढ़ावा देता है। लेकिन इस न्याय, समानता से तो समाज में विघटन के हालात हैं। यदि विघटन उत्पन्न होता हो तो फिर एेसी पॉलिसी क्यों? एक उदाहरण से इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। दौड़ की एक प्रतियोगिता हो रही है। जहां दो खिलाड़ी हैं जिन्हें भाग लेने के लिए ‘समान अवसर’ दिया गया है। शर्त यह है कि जो भी पहले दौड़ को पूरा करेगा वह जीत जाएगा। अब, एक एेसे परिदृश्य की कल्पना करें जहां उनमें से एक महंगा जूते पहन रहा है और उसे अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया गया है। दूसरी तरफ, दूसरा खिलाड़ी नंगे पांव है। क्या वास्तव में यहां ‘अवसर की समानता’ है? क्या यह सिर्फ नियम है? हां। क्या सच्चे अर्थों में यह समानता है?

जवाब होगा नहीं-और इसका कारण शायद लोगों को सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय जैसे नियमों और अवधारणाओं से अवगत कराए। लेकिन, भारत की आरक्षण नीति उतनी ही अपराधपूर्ण हो गई है जितना कि जातिवाद। आरक्षण नीति अब उन सिद्धांतों के खिलाफ जा रही है जिन पर इसे लागू किया गया था। यह नीति बहुत ही त्रुटिपूर्ण हो गई है – और अब यह समाज की मूल्यों वाली प्रणाली को कम कर रही है। आज, आरक्षण नीति उन लोगों को भी वंचित कर रही है जिन्हें उसका लाभ उठाना है। क्या इस नीति से जाति व्यवस्था का अंत होकर बड़ी सामाजिक समानता को बढ़ावा मिलेगा जहां उच्च और निम्न जातियों की अवधारणाएं मौजूद नहीं रहेंगी? किन मूल सवाल तो यह है कि क्या आरक्षण नीति वंचित लोगों को शिक्षा और रोजगार प्रदान करने के लिए पर्याप्त है? नहीं, इसे बदले जाने की जरूरत है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए आरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन इसे विनियमित किया जाना चाहिए ताकि यह प्रतिभा को कमजोर न करे। मेरा मानना है कि भारत की आरक्षण नीति को एक ऐसी योजना से बदला जाना चाहिए जहां गरीब और वंटित पृष्ठभूमि वाले बच्चों को प्राथमिकता से उच्च माध्यमिक स्तर तक उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सके। इसके लिए, सरकार को अपनी शिक्षा प्रणाली को विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ अपग्रेड करना होगा। इसके अलावा, पिछड़े समुदायों के लोगों के पूर्ण पोषण प्रदान करने की एक योजना होनी चाहिए। और आरक्षण नीति, यदि आवश्यक हो, तो वह लोगों को नौकरी की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने में मदद करने के लिए होनी चाहिए। नौकरी के लिए कम्पटीशन में किसी भी रियायत का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। सवाल यह भी है कि हम जाति आधारित आरक्षण का विरोध करते हैं लेकिन पूरी जाति व्यवस्था के खिलाफ विरोध नहीं करते? सवर्ण जातियां एससी/एसटी आरक्षण के मुकाबले पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के खिलाफ क्यों हैं? जहां तक मेरा मानना है- नौकरियों को प्रदर्शन पर आधारित होना चाहिए, जिस तरह से खेल शुद्ध प्रदर्शन पर आधारित होते हैं। अगर किसी के पास शतक बनाने का कोई कौशल नहीं है, तो वह तेंदुलकर बनना भूल जाए। जब तक कोई तेंदुलकर जैसा प्रदर्शन नहीं कर करता, वह उतनी प्रसिद्धि हासिल नहीं कर सकता। यही प्रतिस्पर्धा, प्रेरणा को बढ़ावा देती है। मान लीजिए, भारतीय क्रिकेट बोर्ड फैसला करती है कि भारतीय टीम में 20% खिलाड़ी गांवों के या गरीब अथवा निचली जातियों होने चाहिए, तो क्या एेसे खिलाड़ियों की प्रदर्शन क्षमता बढ़ाने के लिए उपाय नहीं किए जाएंगे। या मान लीजिए, अगर नोबेल समिति का फैसला है कि एक गरीब वैज्ञानिक एक्स का काम आइंस्टीन की सापेक्षता के सिद्धान्त से बेहतर है तो क्या आपको लगेगा कि समिति विज्ञान के प्रति अन्याय कर रही है?

आज की आरक्षण पॉलिसी सिर्फ अजीब ही नहीं, यह मानवता के खिलाफ एक अपराध भी है। गैर सक्षम युवा को नौकरी देकर आप एक योग्य उम्मीदवार के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। जब भी किसी संस्था में विशिष्ट हिस्सों को आरक्षित किया जाता है तो उन सक्षम युवाओं की आशाओं और आकांक्षाओं पर तुषारापात हो जाता है जो उस पद के लिए समर्थ होते हैं। इसके साथ ही, इस नीति से वंचित वर्गों के वे अच्छे कलाकार भी कमजोर हो जाते हैं जिन्होंने योग्यता पर पदक जीते होंगे। किसी भी तरह का जाति, पंथ, पृष्ठभूमि, अर्थव्यवस्था, लिंग के आधार पर आरक्षण योग्यवान युवाअों को अवसरों से वंचित कर देता है। यह तो युवाअों को अन्यायपूर्वक दंडित करने का काम हुआ। जब भी कोई समाज एक अच्छे कलाकार को दंडित करता है, तो समाज के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है। क्या हम चाहेंगे कि योग्यवान युवा आगे न बढ़ सकें और वे कहीं खोकर रह जाएं। आज आरक्षण समर्थक और इसके विरोध में लोग आमने-सामने हैं। आरक्षण का मुद्दा इतना बढ़ गया है कि लोग एक दूसरे की जान लेने पर भी उतारू हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि आरक्षण पिछड़ी जाति के लिए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि आरक्षण प्रणाली 10 साल तक ही रहेगी। किसी भी सूरत में आरक्षण प्रणाली को नहीं बढ़ाया जा सकता है। लेकिन हमारे नेताओं ने आरक्षण का इस्तेमाल अपना वोटबैंक भरने के लिए किया। जहां आरक्षण को 10 साल बाद समाप्त किया जाना था, वहीं इन राजनीतिक पार्टियों ने आरक्षण को 10 साल के लिए और बढ़ा दिया और बढ़ाते चले गए। आरक्षण के पक्ष में संविधान में नए-नए अनुच्छेद जुड़ते गए। आरक्षण के विरोध और समर्थन में होने वाले आन्दोलनों से हुए नुकसान का तो अनुमान लगा लिया जाता है लेकिन इस आरक्षण प्रणाली से मानव और मानवता का कितना नुकसान हो रहा है, वह कहीं भी नहीं है। आईआईटी या एम्स जैसे प्रमुख संस्थानों से पढ़े युवा आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। वे शायद अपने घर के स्कूल और शहर में सबसे अच्छे हैं, लेकिन वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा भयंकर है और सीटों की संख्या कम है लेकिन आरक्षण के उच्च प्रतिशत के साथ आगे समझौता किए जाने से वे बौने हैं। इन युवाओं को अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ता है। उनका यह संघर्ष कभी भी किसी भी आंकड़े का हिस्सा नहीं होगा। अपने जीवन के बाकी हिस्सों के लिए उनका परिवार भी संघर्ष ही करेगा। हम खेल में आरक्षण स्वीकार नहीं करते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि सबसे सक्षम लोग देश और राष्ट्रीय ध्वज का प्रतिनिधित्व करें, तब कम क्षमता कब स्वीकार्य होनी चाहिए? आरक्षण एक सफेद हाथी बन गया है जो विभाजनकारी भी हो गया है। व्यक्तिगत प्रवीणता का लाभ जब देश को नहीं मिले तब एेसी आरक्षण नीति का क्या मतलब?
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