Yash की Toxic कैसी है? KGF वाले Swag के आगे कहानी कितनी टिक पाई? Review पढ़कर करें फैसला

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यश की ‘Toxic: A Fairy Tale for Grownups’ का इंतजार फैंस लंबे समय से कर रहे थे। फिल्म को लेकर माहौल भी जबरदस्त था, लेकिन करीब 200 मिनट की यह गैंगस्टर ड्रामा फिल्म उम्मीद के मुताबिक असर नहीं छोड़ पाती। फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही आता है- क्या सिर्फ यश का स्टारडम फिल्म को बचा सकता है? फिल्म का लुक शानदार है, यश का जलवा बरकरार है, लेकिन कहानी आपको बार-बार उलझाती है। हम इस फिल्म को रेटिंग: ⭐⭐½/5 की रेटिंग देंगे।

क्या है ‘Toxic’ की कहानी?
फिल्म की कहानी 1947 से 1967 के बीच गोवा में सेट है। यश का किरदार राया एक ऐसा शख्स है, जो ओपियम के कारोबार की दुनिया में अपनी जगह बनाते-बनाते बड़ा गैंगस्टर बन जाता है। राया अपनी बहन गंगा (नयनतारा) के साथ मिलकर लोकल डॉन सल्वाडोर के साथ हाथ मिलाता है और ड्रग्स के कारोबार पर अपना दबदबा बनाने की कोशिश करता है। इसी दौरान उसकी जिंदगी में नादिया (कियारा आडवाणी) की एंट्री होती है, जिससे उसे प्यार हो जाता है।

लेकिन प्यार की यह कहानी जल्द ही खून-खराबे और बदले की कहानी में बदल जाती है। नादिया के प्रेग्नेंट होने के बाद राया और सल्वाडोर के बीच दुश्मनी शुरू हो जाती है और यहीं से कहानी लगातार हिंसा और टकराव की तरफ बढ़ती जाती है।

यश ने जीता दिल लेकिन फिर भी फैंस होंगे निराश
अगर ‘Toxic’ में कुछ सबसे ज्यादा भरोसेमंद है तो वो यश हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस जबरदस्त है। कैमरा जब यश पर आता है तो उनका अंदाज, बॉडी लैंग्वेज और स्वैग तुरंत ध्यान खींचता है। कई ऐसे सीन हैं जहां कहानी कमजोर पड़ती नजर आती है, लेकिन यश अपनी मौजूदगी से स्क्रीन को संभाल लेते हैं। हालांकि समस्या यह है कि दमदार कलाकार होने के बावजूद उन्हें ऐसा स्क्रीनप्ले नहीं मिला, जो उनके किरदार की भावनाओं को पूरी तरह उभार सके।

कियारा के साथ केमिस्ट्री अच्छी, लेकिन इमोशन कमजोर
कियारा आडवाणी के साथ यश के कुछ सीन्स फिल्म को थोड़ी राहत देते हैं। राया के सख्त और हिंसक किरदार में नादिया के जरिए एक इमोशनल साइड दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन कहानी जिस तेजी से आगे बढ़ती है, उसमें यह रिश्ता उतना गहराई से जुड़ नहीं पाता, जितनी उम्मीद की जाती है। नयनतारा, हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया के किरदार भी दिलचस्प बनाए जा सकते थे, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाता।

फिल्म में सबसे बढ़िया क्या हैं?
‘Toxic’ देखने में काफी शानदार है। फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन, सिनेमैटोग्राफी और सेट्स बड़े पर्दे के लिए तैयार किए गए हैं। कई फ्रेम बेहद स्टाइलिश हैं और फिल्म में एक अलग तरह का डार्क माहौल बनाया गया है। लेकिन दिक्कत यह है कि कई जगह फिल्म कहानी से ज्यादा अपने विजुअल्स पर भरोसा करती नजर आती है। एक्शन सीक्वेंस भी बड़े स्तर पर शूट किए गए हैं, लेकिन हर फाइट या टकराव वैसा असर नहीं छोड़ता जिसकी उम्मीद यश की फिल्म से की जाती है।

KGF की याद जरूर आएगी
यश को एक बार फिर इतने बड़े और स्वैग वाले गैंगस्टर किरदार में देखकर KGF की याद आना स्वाभाविक है। लेकिन यही तुलना फिल्म के लिए नुकसानदायक भी साबित होती है। ‘Toxic’ अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करती है, मगर कई मौकों पर यश का वही लार्जर-दैन-लाइफ अंदाज दर्शकों को Rocky की याद दिलाता है।

म्यूजिक और एडिटिंग में नहीं दिखा दम
रवि बसरूर का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के माहौल को बड़ा बनाने की कोशिश करता है, लेकिन कई जगह म्यूजिक जरूरत से ज्यादा तेज और भारी महसूस होता है। फिल्म की एडिटिंग भी असमान है। पहला हिस्सा कई बार इतना तेजी से घटनाओं के बीच घूमता है कि कहानी को समझना मुश्किल हो जाता है। वहीं इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार काफी धीमी पड़ जाती है। और करीब 200 मिनट का रनटाइम भी फिल्म के खिलाफ जाता है। कई हिस्सों में ऐसा लगता है कि कहानी आगे बढ़ने के बजाय बस एक के बाद एक घटनाएं जोड़ती जा रही है।

क्यों देखें फिल्में?
‘Toxic’ एक ऐसी फिल्म है जो दिखने में बड़ी है, लेकिन कहानी के स्तर पर उतनी मजबूत नहीं। यश का स्टारडम, शानदार विजुअल्स और बड़े पर्दे वाला ट्रीटमेंट फिल्म की खूबियां हैं। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, असमान पेसिंग, जरूरत से ज्यादा लंबा रनटाइम और कई अधूरे किरदार फिल्म के अनुभव को कमजोर कर देते हैं।

अगर आप यश के कट्टर फैन हैं और उन्हें बड़े पर्दे पर गैंगस्टर अवतार में देखना चाहते हैं, तो ‘Toxic’ आपको कुछ बेहतरीन मोमेंट्स दे सकती है। लेकिन अगर आप एक टाइट और दमदार गैंगस्टर कहानी की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो फिल्म निराश कर सकती है। कुल मिलाकर: यश का स्टारडम है, स्टाइल है, स्केल है… लेकिन कहानी का ‘Toxic’ असर उम्मीद से कम है।

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