शरीर रथ और इंद्रियां घोड़े समानः स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज

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 स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज
— गीता प्रवचन कार्यक्रम का छठा दिन
हनुमानगढ़।
 श्री कल्याण कमल आश्रम हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज ने गीता पर चर्चा करते हुए कहा कि हमारा शरीर ही रथ है, इंद्रिया घोड़े हैं, मन लगाम है, अर्जुन जीवात्मा है, रथी है। अर्जुन शरीर रूपी रथ का मालिक है। यानी आत्मा हमारे शरीर का मालिक है। इसमें सारथी बनकर बैठे हैं भगवान कृष्ण। घोड़े की लगाम है भगवान के हाथों में।
महामंडलेश्वर स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज ने भागवत गीता प्रवचन कार्यक्रम के छठे दिन श्रद्धालुओं के विशाल जनसमूह के समक्ष व्यक्त किए। महाराज जी ने कहा कि हम अपनी मन रूपी लगाम भगवान कृष्ण के हाथों में सौंप दें और अपने मन से निरंतर परमात्मा का चिंतन करना ही मन की लगाम परमात्मा के हाथों में सौपना है। भगवान कृष्ण के हाथों में घोड़े की लगाम है और चाबुक है। युद्ध में घोडौ का संचालन करने के लिए लगाम होती है, और घोड़ा चंचल हो जाए तो उसको दंड देने के लिए चाबुक होती है। इंद्रियां रूपी घोड़े को बुद्धि रूपी चाबुक से आत्मा रूपी कृष्ण अपने अधीन करते हैं। स्वामी जी ने आगे बताया कि चुंबक जैसे लोहे को अपनी ओर खींचता है वैसे ही परमात्मा अपने भक्तों को अपनी ओर खींचते हैं। कृष्ण का अर्थ समझाते हुए महाराज जी ने कहा कृष माने संसार का आवागमन। बार-बार जन्म लेना और मरना। ण का अर्थ है कि आवागमन के कुचक्र से निवृत हो जाना। जो इस आवागमन को मिटाकर आनंद सिंधु में डुबो दे वह ण है। इस प्रकार आवागमन के चक्कर से निकालकर आनंद सिंधु में डुबो दे उसका नाम कृष्ण है। यदि भक्त निरंतर कृष्ण कृष्ण कृष्ण जपेंगे तो आनंद के सिंधु में गोते लगाएंगे। आवागमन के कुचक्र से सदा सदा के लिए छूट जाएंगे।

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