नाबालिग की अभिरक्षा पर हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

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-पिता को मुलाक़ात के लिए बेटे की इच्छा पर निर्भर रहने की सलाह
हनुमानगढ़। राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर की खंडपीठ ने नाबालिग पुत्र की अभिरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पारिवारिक न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए पिता की अपील को निस्तारित कर दिया। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की पीठ ने डी.बी. सिविल विविध अपील संख्या 1243/2025 में सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि मानते हुए पहले पारित आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
मामले में अपीलकर्ता राजाराम ने हनुमानगढ़ स्थित परिवार न्यायालय के 2 जनवरी 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके नाबालिग पुत्र की अभिरक्षा मां रचना अरोरा को दी गई थी। पिता का तर्क था कि मां का पारिवारिक वातावरण बच्चे के उचित पालन-पोषण के लिए अनुकूल नहीं है और वह स्वयं बेहतर शिक्षा व सुविधाएं प्रदान करने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मां नौकरी के कारण बच्चे की देखभाल ठीक से नहीं कर पा रही हैं।
वहीं, प्रतिवादी मां ने अपने जवाब में आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि विवाह टूटने का कारण पिता की शराब की आदत थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से हुए तलाक के दौरान यह तय हुआ था कि नाबालिग पुत्र उनकी अभिरक्षा में रहेगा।
न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए पाया कि विवाह विच्छेद के समय अभिरक्षा को लेकर सहमति बनी थी, जिसे अब चुनौती देना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि समय के साथ बच्चा अब 16 वर्ष का हो चुका है और वह अपनी समझ के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम है।

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