80s Trend Photo: सोशल मीडिया पर धूम मचा रही पुरानी तस्वीरें, क्या आप जानते हैं इनके पीछे छिपा खतरा?

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Instagram और X खोलते ही इन दिनों 80s का दौर (80s trend prompt) लौटता नजर आ रहा है। बड़े बाल, नियोन लाइट्स, पुराने स्टूडियो का बैकग्राउंड और 1986 जैसा लुक। लाखों लोग अपनी आज की सेल्फी ChatGPT पर अपलोड कर रहे हैं और कुछ सेकंड में खुद को 80s के अंदाज में देख रहे हैं।

देखने में यह सिर्फ एक मजेदार फोटो ट्रेंड है, लेकिन इसके पीछे दो बड़े सवाल हैं- आपकी फोटो के साथ क्या हो रहा है और इतनी सारी AI तस्वीरें बनाने की कीमत कौन चुका रहा है?

एक फोटो, सिर्फ एक फोटो नहीं
इस ट्रेंड की खासियत यह है कि AI सिर्फ रंग या फिल्टर नहीं बदलता। वह चेहरे को पहचानने लायक रखते हुए बाल, कपड़े, रोशनी, बैकग्राउंड और पूरी तस्वीर का स्टाइल बदल देता है। यही वजह है कि तस्वीर असली जैसी लगती है। लेकिन इसके लिए आपको अपने चेहरे की हाई-क्वालिटी फोटो AI सिस्टम को देनी पड़ती है।

किसी फोटो में सिर्फ चेहरा नहीं होता। उसमें आंखों, बालों, त्वचा, चेहरे की बनावट और आसपास की जगह से जुड़ी कई जानकारियां भी हो सकती हैं। अगर तस्वीर में कोई दूसरा व्यक्ति, दस्तावेज या लोकेशन से जुड़ी जानकारी दिखाई दे रही है, तो मामला और संवेदनशील हो सकता है।

इसलिए वायरल ट्रेंड में शामिल होने से पहले यह देखना जरूरी है कि आपके अकाउंट में डेटा और मॉडल ट्रेनिंग से जुड़ी सेटिंग्स क्या हैं। खासकर ऐसी तस्वीरें अपलोड करने से बचना बेहतर है जिनमें निजी या पहचान से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी दिखाई दे।

हर AI फोटो की एक पर्यावरणीय कीमत भी है
दूसरा सवाल थोड़ा अलग है। आपके फोन पर कुछ सेकंड में तैयार होने वाली तस्वीर असल में दूर किसी डेटा सेंटर में बन रही होती है। वहां AI मॉडल चलाने के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटिंग पावर चाहिए, जिसका मतलब है बिजली की खपत और सर्वर को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल।

एक तस्वीर की खपत छोटी लग सकती है। लेकिन जब करोड़ों लोग एक ही ट्रेंड में शामिल होते हैं और एक फोटो के कई वर्जन बनाते हैं, तो यही छोटी-छोटी जनरेशन मिलकर बड़ी मांग पैदा करती हैं। यानी 80s की एक तस्वीर सिर्फ nostalgia नहीं है। उसके पीछे डेटा, कंप्यूटिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी कहानी छिपी है।

ट्रेंड खत्म होगा, सवाल बाकी रहेंगे
AI फोटो ट्रेंड गलत है या सही, इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। तस्वीर बनाना अपने आप में समस्या नहीं है। सवाल यह है कि हम उसे बनाते समय किन चीजों को नजरअंदाज कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर 80s का यह ट्रेंड शायद कुछ हफ्तों में बदल जाएगा। लेकिन अपनी डिजिटल पहचान को लेकर सावधानी किसी ट्रेंड की तरह अस्थायी नहीं होनी चाहिए।

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