क्या तृणमूल कांग्रेस का भी होगा शिवसेना जैसा हाल? चुनावी हार के बाद पार्टी में शुरु हुई सबसे बड़ी बगावत

71

क्या ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (Mamata Banerjee) का भी वही हाल होने वाला है जो 2022 में शिवसेना का हुआ था? चुनावी हार के बाद किसी पार्टी में असंतोष और बगावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन TMC के भीतर जिस तेजी से हालात बिगड़ रहे हैं, उससे पार्टी में टूट की आशंका बढ़ गई है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़ा कथित फर्जी हस्ताक्षर मामला है। TMC ने इस मामले में दो विधायकों को तुरंत पार्टी से निष्कासित कर दिया। हालांकि, इस कार्रवाई से संकट कम होने के बजाय और गहरा गया। पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बाद में कुछ अन्य विधायकों के साथ देर रात एक गुप्त बैठक की।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया जब उससे एक दिन पहले ही TMC के 80 में से 60 विधायक ममता बनर्जी के आवास पर बुलाई गई बैठक में नहीं पहुंचे थे। इन घटनाओं ने TMC को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां पार्टी अपने गठन के बाद सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना करती दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में कांग्रेस से अलग होकर हुई थी।

क्या है फर्जी हस्ताक्षर विवाद?
लेकिन आखिर मामला इतनी तेजी से कैसे बढ़ गया? करीब एक महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही TMC के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा था। पार्टी के कुछ सांसद और विधायक सार्वजनिक रूप से नेतृत्व पर सवाल उठा रहे थे। खास तौर पर ममता बनर्जी के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी को निशाने पर लिया जा रहा था, जिन्हें पार्टी में नंबर दो की हैसियत प्राप्त है। चुनाव अभियान से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक लगभग हर फैसले पर अभिषेक की छाप मानी जा रही थी।

सोमवार को मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे हैं, ने एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि TMC के दो विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष के समर्थन वाले पत्र में अपने हस्ताक्षर फर्जी तरीके से इस्तेमाल किए जाने की शिकायत दर्ज कराई है। इसके बाद कथित जालसाजी की जांच के लिए CID जांच के आदेश दिए गए।

सुवेंदु अधिकारी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ ही समय बाद तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया।

इस विवाद को समझने के लिए 6 मई की घटना पर नजर डालनी होगी, जो चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद की है।

उस दिन ममता बनर्जी ने अपने कोलकाता स्थित आवास पर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में उनके करीबी सहयोगी शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम नेता प्रतिपक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया। आनंदबाजार पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, बैठक में मौजूद सभी विधायकों ने हाथ उठाकर इस प्रस्ताव का समर्थन किया था।

9 मई को तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर बताया कि पार्टी विधायक शोभनदेव के समर्थन में हैं। चूंकि अभिषेक बनर्जी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, इसलिए पत्र पर उनके हस्ताक्षर थे। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष ने जवाब में बैठक की कार्यवाही और विधायकों के हस्ताक्षर मांगे।

13 और 14 मई को TMC विधायकों ने विधानसभा में शपथ ग्रहण किया। शपथ लेने के बाद उन्होंने नियम के अनुसार उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए।

इसके बाद 19 मई को पार्टी ने फिर बैठक बुलाई ताकि विधायकों के हस्ताक्षर लेकर विधानसभा में औपचारिक प्रस्ताव जमा किया जा सके। लेकिन उस दिन कई विधायक बैठक में नहीं पहुंचे। इसके बावजूद बाद में TMC ने 70 विधायकों के हस्ताक्षरों वाला दस्तावेज विधानसभा में जमा कर दिया, जिसमें शोभनदेव को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने का समर्थन दर्ज था।

यहीं से विवाद शुरू हुआ?
विधानसभा सचिवालय ने दस्तावेज में कई विसंगतियां पाईं। कुछ हस्ताक्षर पूरे बड़े अक्षरों (कैपिटल लेटर) में थे, जबकि कुछ में सिर्फ शुरुआती अक्षर लिखे गए थे। जब इन हस्ताक्षरों की तुलना 13-14 मई को उपस्थिति रजिस्टर में किए गए हस्ताक्षरों से की गई तो लगभग 20 हस्ताक्षर मेल नहीं खाते पाए गए। आनंदबाजार पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद विधानसभा सचिव ने जालसाजी का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई।

27 मई को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने भी अपने हस्ताक्षर फर्जी तरीके से इस्तेमाल किए जाने की शिकायत दर्ज कराई, जिससे पार्टी की मुश्किलें और बढ़ गईं। मामले की जांच अब CID कर रही है और जांच का फोकस अभिषेक बनर्जी पर भी आ गया है। उन्हें पूछताछ के लिए समन भेजा गया है।

इस आंतरिक संकट ने भाजपा को भी TMC पर हमला बोलने का अवसर दे दिया है। सोमवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि TMC ने अपने ही विधायकों के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा, “CID ने उन 14 विधायकों में से 13 से बात की, जिनके हस्ताक्षर ब्लॉक लेटर में थे। इनमें से तीन विधायकों ने कैमरे पर स्वीकार किया कि उन्होंने उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।”

ये भी पढ़ें: क्या ममता बनर्जी अपनी TMC को बचा पाएंगी या पार्टी उनके हाथों से फिसल जाएगी?

क्या TMC टूट की ओर बढ़ रही है?
कुछ ही घंटों बाद TMC ने ऋतब्रत और संदीपन को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। हालांकि पार्टी ने निष्कासन का स्पष्ट कारण नहीं बताया, लेकिन सूत्रों के मुताबिक आशंका थी कि दोनों पार्टी के भीतर एक “एंटी-अभिषेक गुट” तैयार करने की कोशिश कर रहे थे।

सोमवार देर रात ऋतब्रत और संदीपन ने कोलकाता के विधायक हॉस्टल में कुछ TMC विधायकों के साथ गुप्त बैठक की। बैठक में पश्चिम मेदिनीपुर की एक महिला विधायक भी शामिल थीं। TMC का मानना है कि दोनों नेताओं को निष्कासित कर देने से वे पार्टी के भीतर किसी असंतुष्ट गुट का नेतृत्व नहीं कर पाएंगे।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का समय पार्टी के लिए और अधिक चिंता का विषय बन गया है। एक दिन पहले ही अभिषेक बनर्जी और सांसद कल्याण बनर्जी पर हो रहे हमलों के बाद ममता बनर्जी ने विधायकों की बैठक बुलाई थी, लेकिन 80 में से लगभग 60 विधायक उसमें नहीं पहुंचे। बाद में बैठक रद्द कर दी गई।

पंचदूत अब व्हाट्सएप चैनल पर उपलब्ध है। लिंक पर क्लिक करें और अपने चैट पर पंचदूत की सभी ताज़ा खबरें पाएं।

इससे अटकलों को और बल मिला कि ममता बनर्जी के लिए पार्टी को एकजुट बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। यही वजह है कि अब इस स्थिति की तुलना 2022 में शिवसेना में हुई बगावत से की जा रही है, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 40 विधायकों ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

TMC प्रवक्ता कुनाल घोष ने दावा किया कि निष्कासित विधायक पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता के एक होटल में कुछ विधायकों के साथ गुप्त बैठक भी की थी। हालांकि ऋतब्रत बनर्जी ने इन आरोपों से इनकार किया है। इस बीच निलंबित TMC नेता रिजू दत्ता के एक दावे ने पार्टी की चिंता और बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि 50 TMC विधायक गेटवे होटल में मिले थे और वे खुद को “असली तृणमूल कांग्रेस” घोषित करने की तैयारी कर रहे हैं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात संख्या की है। दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए TMC के 80 विधायकों में से कम से कम दो-तिहाई यानी करीब 53 विधायकों का अलग होना जरूरी होगा। अब देखना यह होगा कि कथित बागी गुट इतनी बड़ी संख्या में समर्थन जुटा पाता है या नहीं, क्योंकि पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं का बड़ा वर्ग अब भी ममता बनर्जी के साथ खड़ा नजर आ रहा है।

देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (Hindi News) पढ़ें। आप हमें फेसबुकट्विटरइंस्ट्राग्राम और यूट्यूब चैनल पर फॉलो कर सकते हैं।