कोल्हापुर के नांदणी गांव में स्थित एक पुराने जैन मठ की प्रिय हथिनी ‘महादेवी’ (जिसे लोग माधुरी भी कहते हैं) (madhuri elephant) को लेकर बीते दिनों जो कुछ हुआ, उसने पूरे इलाके में नाराजगी और आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। यह हथिनी पिछले करीब 30 वर्षों से मठ का हिस्सा थी, जिसे अब पशु कल्याण के आधार पर गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा वन्यजीव देखभाल केंद्र भेज दिया गया है। लेकिन इस फैसले का स्थानीय लोगों ने पुरज़ोर विरोध किया है।
विरोध इतना बढ़ गया है कि कोल्हापुर में रिलायंस कंपनी का विरोध तेज हो गया है। लोग जियो सिम बदल रहे हैं। अनंत अंबानी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल ही में पशु अधिकार संगठन पीटा इंडिया ने आरोप लगाया कि महादेवी के साथ ठीक से व्यवहार नहीं हो रहा है।
उसकी सेहत पर भी सवाल उठाए गए। इसी के आधार पर एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई, जिसने महादेवी को किसी विशेषज्ञ वन्यजीव पुनर्वास केंद्र में भेजने की सिफारिश की। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए हथिनी को वंतारा भेजने का आदेश दिया। मठ की ओर से कोर्ट में अपील की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी इस अपील को खारिज कर दिया।
सोशल मीडिया पर माधुरी को लेकर अलग-अलग विचार है। किसी का मानना है कि 30 सालों तक माधुरी का इस्तेमाल किया गया है धर्म के नाम वहीं, कई लोगों ने वंतारा जैसी निजी संस्था पर सवाल उठाए हैं।
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आधी रात को ‘माधुरी’ को ले जाया गया, विरोध तेज
कोर्ट के आदेश के बाद 28 जुलाई की रात भारी पुलिस सुरक्षा में महादेवी को वन विभाग की टीम ने मठ से निकाला। उसे विशेष एंबुलेंस से गुजरात भेजा गया। जब उसे ले जाया जा रहा था, तो गांव के सैकड़ों लोग भावुक होकर उसे विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। कई की आंखें नम थीं, तो कुछ हाथ जोड़कर खड़े थे।
हथिनी को भेजे जाने के अगले ही दिन 29 जुलाई को गांव में प्रदर्शन शुरू हो गया। हजारों ग्रामीणों ने सड़कों पर उतरकर नारेबाज़ी की। कुछ गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने सरकारी गाड़ियों पर पथराव कर दिया और हथिनी को ले जा रहे वाहन का पीछा किया। हालात बिगड़ने पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इस झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए और दर्जनों लोगों को हिरासत में लिया गया।

Peta India ने जताई माधुरी की सेहत पर चिंता
माधुरी की सेहत को लेकर गंभीर चिंताएं थीं, जिसे PETA इंडिया और वन विभाग ने अदालत में उठाया। मेडिकल जांच में पाया गया कि माधुरी को पैरों में संक्रमण (फुट रॉट), आर्थराइटिस, पोषण की कमी, त्वचा संबंधी बीमारियां और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं थीं। उसे लंबे समय तक जंजीरों में बांधकर एकांत में रखा गया था, जिससे उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा।
सोशल मीडिया पर भी उबाल, Jio और वंतारा का विरोध
माधुरी को वंतारा भेजे जाने को लेकर सोशल मीडिया पर भी विरोध तेज हो गया है। वंतारा, रिलायंस समूह द्वारा संचालित वन्यजीव देखभाल केंद्र है। इसके चलते कोल्हापुर और आसपास के इलाकों में रिलायंस के खिलाफ नाराज़गी देखने को मिल रही है। लोगों ने Jio सिम कार्ड का बहिष्कार शुरू कर दिया है। ट्विटर और फेसबुक पर #MadhuriElephant #SaveMahadevi, #Bringbackmadhuri और #BoycottJio जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि ये धार्मिक भावनाओं का अपमान है।
माधुरी को लेकर सरकार से लगाई गुहार
कोल्हापुर के कुछ स्थानीय नेताओं ने भी सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। कुछ नेताओं ने कहा कि हथिनी को वापस लाने के प्रयास किए जाने चाहिए क्योंकि यह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है। महाराष्ट्र सरकार ने भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मामले की समीक्षा शुरू की है। पशुपालन विभाग और वन विभाग के बीच बैठकें जारी हैं, जिसमें हथिनी को फिर से कोल्हापुर लाने पर चर्चा की जा रही है।
जब देश में मौजूद थे विकल्प, फिर क्यों झुका सिस्टम अंबानी के आगे?
क्या माधुरी का इलाज सिर्फ वंतारा में ही संभव था? यह सवाल अब विरोध का बड़ा आधार बन गया है। भारत में कई प्रमुख सरकारी संस्थान और वन्यजीव पुनर्वास केंद्र हैं, जैसे भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), वन्यजीव ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI), और बेंगलुरु, नागपुर, मैसूर, असम, केरल जैसे शहरों में वन विभाग के विशेष केंद्र जहाँ जानवरों की चिकित्सा और पुनर्वास की व्यापक सुविधाएं मौजूद हैं। इसके अलावा, राज्य सरकारों के अधीन कई रेस्क्यू यूनिट्स भी वर्षों से काम कर रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब देश में पहले से ही संसाधन और विशेषज्ञ मौजूद हैं, तो फिर एक निजी संस्था वंतारा को ही माधुरी के इलाज और पुनर्वास का एकमात्र विकल्प क्यों माना गया?
#Bringbackmadhuri #BoycottJio अब अधिकारों के लिये यही आवश्यक बन गया है तो यही सही । #Jain #जैन_विरोधी_भाजपा pic.twitter.com/8xAXiCmLhy
— जैन एकता मंच,राष्ट्रीय(रजि.) (@JAINEKTAMANCHH) August 1, 2025
कोल्हापुर के नांदणी गांव में स्थित एक पुराने जैन मठ की प्रिय हथिनी ‘महादेवी’ (जिसे लोग माधुरी भी कहते हैं) (madhuri elephant) को लेकर बीते दिनों जो कुछ हुआ, उसने पूरे इलाके में नाराजगी और आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। #MadhuriElephant #Bringbackmadhuri pic.twitter.com/e09wMZRM7r
— Panchdoot (@Panchdoot1) August 2, 2025
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वंतारा में कैसी है महादेवी की स्थिति?
गुजरात के वंतारा वन्यजीव केंद्र ने कहा है कि महादेवी को बेहतर देखभाल मिल रही है। उसे हाइड्रोथैरेपी, मेडिकल चेकअप और अन्य हाथियों के साथ एक सुरक्षित माहौल दिया गया है। विशेषज्ञों की एक टीम उसकी सेहत पर नजर बनाए हुए है।
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वंतारा पर लगातार लग रहे हैं गंभीर आरोप
वंतारा, जो रिलायंस इंडस्ट्रीज के CSR पहल के तहत अनंत अंबानी द्वारा स्थापित एक वन्यजीव रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन सेंटर है, अब इन दिनों निजी वन्यजीव संरक्षण की सबसे चर्चित संस्थाओं में शामिल हो गया है। लेकिन इसके साथ ही संस्थागत विवाद और नैतिक आलोचना भी सामने आ रही है।
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वंतारा में अब तक लगभग 200 हाथी सुरक्षित देखभाल में लिए गए हैं। इसके अलावा, पशु संरक्षक आंकड़े बताते हैं कि इस परिसर में 43 अलग-अलग प्रजातियों के 2,000 से ज़्यादा जानवर बसे हुए हैं, और कुछ रिपोर्टों के अनुसार इसकी संख्या 150,000 तक भी पहुँच चुकी है। ये आंकड़े 1.5 लाख जानवर और 2,000+ स्पीशीज़ तक फेल चुके हैं।
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जामनगर, गुजरात का यह केंद्र पूरी तरह से निजी है और आम जनता के लिए नहीं खोला गया है। इसकी 3000–3500 एकड़ में फैली हरियाली, झीलें, चिकित्सा केंद्र, हाइड्रोथैरेपी पूल आदि दिखने में तो आधुनिक और तकनीकी तो दिखता है, लेकिन उसमें जानवरों की स्वतंत्रता, स्थानीय समुदायों से जुड़ाव और पारदर्शिता पर प्रश्न उठ गए हैं।
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जर्मन अखबार Süddeutsche Zeitung की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि इस रिहैबिलिटेशन सेंटर ने 32 देशों से लगभग 39,000 जानवरों को लाकर रखा है। इनमें से कुछ देशों जैसे यूएई, वेसमाला, कांगो आदि से आए जानवर अवैध व्यापार के संदेह वाले देश बताए गए हैं। हालांकि वंतारा ने इन आरोपों से इनकार किया है।
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विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की आलोचना यह भी है कि वंतारा उन जानवरों को “रेस्क्यू” बताता है जो पहले किसी धार्मिक संस्था, सर्कस, ज़ू या स्थानीय परिवार की देखभाल में थे—लेकिन उनके स्वैच्छिक हाँथ से नहीं, बल्कि निजी योग्यता और कानूनी दबाव के कारण उन्हें वंतारा भेजा गया।
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पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की बड़ी संख्या में जानवरों को एक निजी केंद्र में समाहित करना, जहाँ सार्वजनिक निगरानी न हो, एक “एलिट वन्यजीव संग्रह” (vanity zoo) जैसा प्रतीत होता है।
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वंतारा ने इसे जायज़ ठहराया है कि सभी जानवर कानूनी रूप से ज़ोओ अथॉरिटी, वन विभाग और केंद्रीय सरकार से अनुमति लेकर ही लाए गए। लेकिन पारदर्शिता की कमी और बड़े पैमाने पर जानवरों की संख्या को लेकर चिंताओं ने इसे सवालों के घेरे में ला दिया है।
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