पिछले 24 घंटे ऐसे रहे, जिन्हें देखकर लगा कि दुनिया एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रही है। माहौल पूरी तरह तनाव से भरा था। दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठे Donald Trump ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो ईरान को पूरी तरह तबाह (US Iran Ceasefire) कर दिया जाएगा।
इसी बीच अमेरिकी सेना की गतिविधियां तेजी से बढ़ीं। USS Tripoli पर फायरिंग ड्रिल्स हुईं और ब्रिटेन के RAF Fairford से परमाणु क्षमता वाले B-52 बॉम्बर ने उड़ान भरी। हर संकेत यही बता रहा था कि अब कुछ बहुत बड़ा होने वाला है।
दूसरी ओर Iran भी पूरी तैयारी में था। उसके निशाने पर मिडिल ईस्ट के बड़े ऊर्जा ठिकाने थे। खासतौर पर Strait of Hormuz, जो दुनिया की तेल सप्लाई की लाइफलाइन माना जाता है, एक बड़ा फ्लैशपॉइंट बन चुका था। लेकिन जब सब कुछ युद्ध की तरफ बढ़ता दिख रहा था, तभी अचानक कहानी ने मोड़ लिया। आखिरी कुछ घंटों में, जब डेडलाइन खत्म होने वाली थी, उसी समय सीजफायर का ऐलान हो गया।
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ट्रंप आखिर पीछे क्यों हटे?
अचानक से दुनिया में फिर सबकुछ बदल गया। यह वही सवाल है जो पूरी दुनिया पूछ रही है। जिस अमेरिका ने लगातार आक्रामक रुख अपनाया, वही अचानक शांति की बात क्यों करने लगा? दरअसल, इसका जवाब सिर्फ युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और जनता के मूड में छिपा है।
ईरान की प्रमुख मांगें
ईरान ने जो शर्तें रखीं, वे बेहद सख्त थीं। उसने साफ कहा कि Strait of Hormuz पर उसका प्रभाव बना रहेगा और यह पहले जैसा पूरी तरह खुला नहीं होगा। साथ ही उसने युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई, विदेशों में जब्त संपत्तियों की वापसी और मिडिल ईस्ट से अमेरिकी सेना की वापसी की मांग रखी। इतना ही नहीं, ईरान ने International Atomic Energy Agency के प्रस्ताव खत्म करने और अपने ऊपर लगे सभी प्रतिबंध हटाने की भी शर्त रख दी। इन मांगों को मानना किसी भी बड़ी ताकत के लिए आसान नहीं होता। फिर भी अमेरिका ने बातचीत के रास्ते को चुना।
ट्रंप के मुताबिक नहीं चला ईरान
विश्लेषकों का मानना है कि असली वजह यह थी कि यह युद्ध अमेरिका की योजना के मुताबिक आगे नहीं बढ़ रहा था।अमेरिका ने सोचा था कि शुरुआती हमलों से ईरान दबाव में आ जाएगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। ईरान ने पूरे मिडिल ईस्ट में जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी और वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर असर पड़ने लगा। Strait of Hormuz पर बढ़ते तनाव ने दुनिया भर में तेल बाजार को हिला दिया।
अमेरिका के अंदर बढ़ता विरोध
युद्ध सिर्फ बाहर नहीं लड़ा जा रहा था, बल्कि अमेरिका के भीतर भी इसका असर दिखने लगा था। जनता इस युद्ध के खिलाफ थी। लोगों को लगने लगा कि यह एक अनावश्यक लड़ाई है। मार्च के अंत में हुए “No Kings 3.0” जैसे बड़े प्रदर्शनों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। यह विरोध सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक असंतोष का भी संकेत था।आने वाले चुनावों ने इस दबाव को और बढ़ा दिया। Republican Party के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती थी, क्योंकि Democratic Party पहले ही कई जगह बढ़त बना रहा था।
युद्ध की आर्थिक कीमत
यह युद्ध सिर्फ रणनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी भारी पड़ रहा था।
- शुरुआती 6 दिनों में ही करीब 11.3 बिलियन डॉलर खर्च
- 12वें दिन तक यह बढ़कर लगभग 16.5 बिलियन डॉलर
- पांच हफ्तों में कुल खर्च 30–40 बिलियन डॉलर के पार
ऐसे में अमेरिकी नागरिकों के बीच यह सवाल फिर उठने लगा कि जब हेल्थकेयर के लिए पैसा नहीं है, तो युद्ध के लिए इतना खर्च क्यों।

इज़राइल का प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध मूल रूप से अमेरिका का नहीं था। अमेरिका इसमें Israel की सुरक्षा चिंताओं के चलते शामिल हुआ था, खासकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके सहयोगी संगठनों को लेकर। लेकिन जैसे-जैसे युद्ध बढ़ा, ईरान ने मिडिल ईस्ट में जवाबी कार्रवाई तेज कर दी, जिससे वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर असर पड़ा और Strait of Hormuz पर दबाव बढ़ गया।
डेडलाइन, देरी और आखिरकार समझौता
Donald Trump ने 21 मार्च से ईरान को कई बार डेडलाइन दी। हर बार यह कहा गया कि यह आखिरी मौका है।पहले 48 घंटे, फिर 10 दिन, फिर 24 घंटे डेडलाइन बढ़ती रही और साथ ही बातचीत भी चलती रही। आखिरकार, जब हालात नियंत्रण से बाहर होते दिखे, तो कूटनीति ने जगह बना ली और सीजफायर का रास्ता चुना गया।
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