भारत के सबसे बड़े कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Kudankulam Nuclear Power Plant) से जुड़ी संवेदनशील जानकारी डार्क वेब पर लीक होने का दावा किया गया है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, World Leaks नाम के एक रैनसमवेयर ग्रुप ने डार्क वेब पर हजारों फाइलें अपलोड की हैं, जिनमें प्लांट के कुछ ब्लूप्रिंट, सप्लायर की जानकारी और अन्य तकनीकी दस्तावेज होने का दावा किया गया है। हालांकि, Reuters इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है।
रिलायंस ने क्या कहा?
कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की कुछ परियोजनाओं में शामिल अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप ने बयान जारी कर कहा कि उसके एक सर्वर में आंशिक डेटा ब्रीच (Partial Data Breach) हुआ है। कंपनी के मुताबिक, यह सर्वर थर्ड पार्टी डेटा सेंटर कंपनी Yotta द्वारा होस्ट किया जा रहा था। रिलायंस ने कहा कि इस घटना की जानकारी सरकार को दे दी गई है। हालांकि, कंपनी ने यह नहीं बताया कि कौन-सा डेटा प्रभावित हुआ है।
किन दस्तावेजों के लीक होने का दावा?
रिपोर्ट के अनुसार, डार्क वेब पर डाले गए दस्तावेज 2016 से 2025 के बीच के बताए जा रहे हैं। इनमें कथित तौर पर—
- यूनिट 3 और यूनिट 4 के वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के ब्लूप्रिंट
- कंट्रोल रूम का लेआउट
- सप्लायर और वेंडर की जानकारी
- निरीक्षण और बैठकों के रिकॉर्ड
- उपकरणों की समीक्षा
- बीमा (इंश्योरेंस) से जुड़े दस्तावेज
जैसी जानकारी शामिल है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लीक हुए दस्तावेज परमाणु रिएक्टर के मुख्य (Core) सिस्टम से जुड़े नहीं हैं। ये सिस्टम रूस की सरकारी कंपनी Rosatom ने तैयार किए हैं।
सरकारी एजेंसियां कर रही हैं जांच
रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCIL) इस मामले में रिलायंस के संपर्क में है। वहीं, भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In भी पूरे मामले की जांच कर रही है। हालांकि, परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) और NPCIL ने इस मामले पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

Yotta ने क्या कहा?
डेटा सेंटर कंपनी Yotta ने बताया कि 29 मई को रिलायंस के सर्वर पर संदिग्ध गतिविधि देखी गई थी। कंपनी का दावा है कि संभावित रैनसमवेयर हमले को उसी समय रोक दिया गया था। हालांकि, जून के आखिर में रिलायंस ने उन्हें बताया कि बाहरी साइबर हमलावरों ने डेटा लीक होने का दावा किया है। Yotta का कहना है कि वह इन दावों की पुष्टि नहीं कर पाई है, लेकिन जांच में पूरा सहयोग कर रही है।
क्यों गंभीर माना जा रहा है मामला?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसे तकनीकी दस्तावेज गलत हाथों में पहुंचते हैं, तो उनका इस्तेमाल संयंत्र की सपोर्ट सिस्टम, सप्लाई चेन और सुरक्षा व्यवस्था को समझने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, अभी तक इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि प्लांट की सुरक्षा या संचालन पर कोई असर पड़ा है।
पहले भी हो चुका है साइबर हमला
यह पहली बार नहीं है जब कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का नाम साइबर सुरक्षा से जुड़े मामले में सामने आया है। 2019 में भी इस संयंत्र के प्रशासनिक नेटवर्क में उत्तर कोरिया से जुड़े एक हैकर ग्रुप का मैलवेयर मिलने की खबर आई थी। उस समय NPCIL ने कहा था कि प्लांट के संचालन या सुरक्षा प्रणाली पर उसका कोई असर नहीं पड़ा था। फिलहाल, पूरे मामले की जांच जारी है और एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि डेटा लीक का दावा कितना सही है और इससे किसी तरह का सुरक्षा खतरा पैदा हुआ है या नहीं।
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