– राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त प्रहलाद राय टाक सहित भाजपा नेताओं ने की पूजा-अर्चना, आचार्य दयानंद शास्त्री ने प्रेम, धर्म और भक्ति का दिया संदेश
हनुमानगढ़। जंक्शन स्थित जाट भवन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का श्रवण कर भक्तिरस में सराबोर हो गए। कथा प्रारंभ होने से पूर्व मुख्य यजमान राजस्थान माटी कला बोर्ड के अध्यक्ष (राज्यमंत्री दर्जा) प्रहलाद राय टाक, भाजपा जिलाध्यक्ष प्रमोद डेलू, पूर्व जिलाध्यक्ष बलवीर बिश्नोई तथा भाजपा नेता अमित चौधरी ने सपत्नीक एवं परिवार सहित व्यासपीठ पर विधिवत पूजा-अर्चना कर कथा का शुभारंभ कराया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी अतिथियों ने भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर प्रदेश और समाज की सुख-समृद्धि की कामना की।
कथा व्यास आचार्य दयानंद शास्त्री ने अपने प्रवचनों में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला, कंस उद्धार और रुक्मिणी विवाह के दिव्य प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन को प्रेम, भक्ति, त्याग और धर्म का मार्ग दिखाने वाला दिव्य ग्रंथ है। इसके श्रवण से मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आता है और उसका जीवन ईश्वर की ओर अग्रसर होता है।
आचार्य शास्त्री ने रासलीला का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कहा कि रासलीला आत्मा और परमात्मा के दिव्य मिलन का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति में किसी प्रकार का अहंकार या स्वार्थ नहीं होता। जब भक्त पूर्ण समर्पण भाव से भगवान का स्मरण करता है, तब उसे ईश्वर की कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है।
इसके बाद उन्होंने कंस उद्धार का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध कर धर्म की पुनर्स्थापना की। उन्होंने कहा कि जब भी समाज में अन्याय, अत्याचार और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। कंस का अंत यह संदेश देता है कि अहंकार और अधर्म की आयु अधिक नहीं होती तथा अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।
कथा के दौरान रुक्मिणी विवाह प्रसंग का भी अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया। आचार्य शास्त्री ने बताया कि माता रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानते हुए अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उन्हें पति रूप में स्वीकार किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी भक्त की पुकार सुनकर रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह किया। यह प्रसंग अटूट विश्वास, समर्पण और सच्ची भक्ति की सर्वोच्च मिसाल है।
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