मार्च का महीना इस बार बाजार के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने ग्लोबल स्तर पर तेल और गैस की चिंता बढ़ा दी है। इसका असर सीधा शेयर बाजार पर दिख रहा है मार्केट लगातार (Share Market) दबाव में है, वहीं सोने-चांदी में भी पिछले एक हफ्ते में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
इस पूरे माहौल में अगर कोई चीज मजबूत हुई है, तो वो है डॉलर। लेकिन डॉलर की यही मजबूती भारतीय बाजार के लिए परेशानी बन गई है। विदेशी निवेशक अब भारत से पैसा निकालकर डॉलर की तरफ जा रहे हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो सिर्फ 26 फरवरी से 20 मार्च के बीच, यानी करीब 16 ट्रेडिंग सेशंस में, विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगभग 1 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए। यह औसतन हर घंटे करीब 1000 करोड़ रुपये की निकासी के बराबर है, जो अपने आप में काफी बड़ा आंकड़ा है।
अगर पूरे 2026 की बात करें, तो अब तक हुए करीब 50 ट्रेडिंग सेशंस में से 33 दिनों में विदेशी निवेशकों ने बिकवाली की है। यानी ज्यादातर समय बाजार से पैसा बाहर ही जा रहा है।
भारत महंगा, विदेशी निवेशकों को पसंद अन्य बाजार
भारत का शेयर बाजार इस समय विदेशी निवेशकों के लिए उतना आकर्षक नहीं दिख रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय बाजार की वैल्यूएशन अभी भी कई दूसरे ग्लोबल बाजारों के मुकाबले ज्यादा है। वहीं अमेरिका, यूरोप, चीन और कोरिया जैसे बाजारों में बेहतर रिटर्न और नई टेक्नोलॉजी से जुड़े मौके मिल रहे हैं, जिससे निवेशकों का रुख धीरे-धीरे भारत से हटकर इन देशों की ओर जा रहा है।
इसका असर साफ तौर पर विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी में दिख रहा है। 15 मार्च तक उनका कुल निवेश घटकर करीब ₹65.63 लाख करोड़ रह गया है, जो एक महीने पहले ₹71.77 लाख करोड़ और दिसंबर 2025 में ₹74.27 लाख करोड़ था। बाजार में उनकी हिस्सेदारी भी कम होकर 15.3% पर आ गई है, जो एक साल पहले 16.3% थी।

हालांकि इस दौरान घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभालने की कोशिश की। घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII ने करीब ₹1.16 लाख करोड़ की रिकॉर्ड खरीदारी की। अगर इसे औसत में देखें तो हर घंटे करीब ₹1200 करोड़ का निवेश हुआ, लेकिन इसके बावजूद बाजार गिरावट से नहीं बच पाया।
इससे साफ होता है कि भारतीय बाजार में अभी भी विदेशी निवेशकों का प्रभाव काफी ज्यादा है, और उनके फैसले ही बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
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