महिला आरक्षण पर संसद में टकराव: 3 बड़े बिलों पर बहस शुरू,समझिए पूरा बिल इन 8 बड़े पॉइंट्स में

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भारत की संसद में अगले तीन दिनों तक तीन अहम विधेयकों पर चर्चा होने जा रही है, जिनका सीधा संबंध महिलाओं को 33% आरक्षण देने से है। जहां सरकार इन बिलों को महिला सशक्तिकरण के लिए जरूरी बता रही है, वहीं विपक्ष ने इन्हें राजनीतिक और संवैधानिक रूप से विवादित करार दिया है। सरकार ने 2029 के लोकसभा चुनावों से महिला आरक्षण अधिनियम लागू करने के लिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है। सूत्रों के अनुसार, 815 सीटें राज्यों के लिए और बाकी 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए प्रस्तावित हैं।

850 में से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। सरकार 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में 2029 से लोकसभा में 33% महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने की योजना बनाई है।

इन प्रस्तावित कानूनों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने, राज्यों में सीटों के पुनर्वितरण और परिसीमन प्रक्रिया को लागू करने जैसे बड़े बदलाव शामिल हैं, जो आने वाले समय में देश की राजनीति का स्वरूप बदल सकते हैं। आइए इस पूरे मामले को 8 बड़े पॉइंट्स में समझते हैं।

पहले जानिए बिल क्या है?

तीन प्रमुख बिल संसद में पेश किए जाने वाले हैं:

पहला बिल: संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें 815 सीटें राज्यों से सीधे चुने गए प्रतिनिधियों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। साथ ही राज्यों की विधानसभा सीटों में भी जनसंख्या के आधार पर बदलाव का प्रस्ताव है।

दूसरा बिल: यह यूनियन टेरिटरी एक्ट, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम और GNCT दिल्ली एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव रखता है, जिससे परिसीमन और विधानसभा सीटों में बदलाव संभव हो सके।

तीसरा बिल: नए परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के गठन के लिए एक नया कानून लाने का प्रस्ताव है, जो सीटों के पुनर्निर्धारण का काम करेगा।

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विवाद कहां पर है?

इस मुद्दे पर दो बड़े सवाल हैं:

  1. जनसंख्या का आधार क्या होगा?
  2. किन राज्यों की सीटें कम या ज्यादा होंगी?

संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर होता है। लेकिन 2001 और 2003 के संशोधनों के बाद 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण 2026 के बाद तक स्थगित कर दिया गया था।अब नए बिल में इस ‘फ्रीज’ को हटाने का प्रस्ताव है, जिससे संसद तय करेगी कि कौन-सी जनगणना के आंकड़े लागू होंगे। यही वजह है कि यह बहस शुरू हो गई है कि 2011 की जनगणना या कोई अन्य डेटा इस्तेमाल किया जाएगा।

परिसीमन से जुड़ा है आरक्षण (Reservation linked to delimitation)

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार महिलाओं को आरक्षण तभी मिलेगा जब परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।

इसका मतलब है कि पहले पूरे देश और राज्यों में सीटों का पुनर्निर्धारण होगा, उसके बाद ही महिलाओं को 33% आरक्षण लागू किया जाएगा।

इससे दो बड़े सवाल खड़े होते हैं:

  • परिसीमन में कितना समय लगेगा?
  • कौन-सी जनगणना का डेटा इस्तेमाल होगा?

महिला संगठनों, सांसदों और वकीलों ने इस पर आपत्ति जताते हुए आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग की है।

परिसीमन में क्या होगा?
अभी तक सीटों का आधार 1971 की जनगणना थी, जो 2026 तक के लिए मान्य थी। परिसीमन कब होगा और किस जनगणना (जैसे 2011 या 2027) के आधार पर होगा, यह संविधान की जगह संसद एक साधारण कानून बनाकर तय कर सकेगी।

सरकार इसमें बदलाव कर रही है। इसके लिए जनसंख्या (आबादी) की परिभाषा को बदला जाएगा है। इससे संसद को यह तय करने का अधिकार मिलता है कि सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए किस डेटा को आधार बनाया जाए। इसके लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही गई है।

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संविधान में संशोधन कर सरकार परिसीमन आयोग बनाएगी। अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व जज होंगे। आयोग सभी निर्वाचन क्षेत्र (लोकसभा सीटें) दोबारा तय करेगा। आयोग का निर्णय अंतिम होगा। इसके फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकते।

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विपक्ष समर्थन में लेकिन विरोध भी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह BJP की “खतरनाक योजना” है, जिसके जरिए 2029 के चुनाव के लिए सीटों को अपने पक्ष में ढाला जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे परिसीमन आयोग को पूरी शक्ति मिल जाएगी। नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (BJD) और के. चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति (BRS) जैसे दल, जो पहले मुद्दों पर सरकार का समर्थन करते थे, अब परिसीमन को लेकर सख्त रुख अपना चुके हैं। विपक्ष ने साफ कहा है कि वह महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ने का विरोध करेगा। उनका कहना है कि 2029 चुनावों को ध्यान में रखकर यह रणनीति बनाई गई है।

किन राज्यों में कितनी सीटें बढ़ने का अनुमान?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ सकती है। यहां 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

महिला, SC/ST आरक्षण कैसे लागू होगा? (HOW WILL QUOTAS WORK?)

प्रस्तावित परिसीमन बिल के अनुसार आयोग तय करेगा:

  • लोकसभा सीटों का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बंटवारा
  • SC/ST के लिए आरक्षित सीटें
  • एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर बदलती रहेंगी। SC/ST श्रेणी में भी यह रोटेशन लागू होगा।

क्या दक्षिणी राज्यों की सीटें कम होंगी?
दक्षिण भारत के राज्यों ने इस प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जनसंख्या आधारित सीटों के पुनर्वितरण से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो सकती है। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपाय अपनाए हैं, उनकी सीटें घट सकती हैं, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को फायदा हो सकता है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल ने कहा कि अगर राज्यों की राजनीतिक ताकत कम होती है, तो इसे नकारात्मक रूप से देखा जाएगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर सीटें कम की गईं तो विरोध प्रदर्शन होंगे।

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