IT की 200 ठिकानों पर रेड, राजनीतिक चंदे की काली सच्चाई से हिला सरकारी सिस्टम, जानें पूरा मामला?

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80GGC के तहत पॉलिटिकल पार्टियों या इलेक्टोरल ट्रस्ट को दिए गए दान पर टैक्स में छूट मिलती है। लेकिन सूत्रों ने बताया कि कई बिचौलियों ने इस छूट का गलत फायदा उठाया।

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13 जुलाई 2025 की सुबह आयकर विभाग की टीमों ने एक साथ देशभर के 200 से (Tax Raids ) अधिक ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई महज एक टैक्स रूटीन नहीं, बल्कि एक संभावित बड़े राजनीतिक-आर्थिक घोटाले की परतें खोलने जा रही है। देश भर में इनकम टैक्स विभाग ने 200 से ज्यादा ठिकानों पर छापेमारी की जिसमें पॉलिटिकल डोनेशन, ट्यूशन फीस और मेडिकल खर्चों के नाम पर सबसे बड़ा घपला सामने आया है।

विभाग को शिकायतें मिली थीं कि कई लोग नकली बिलों के जरिए टैक्स बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें पॉलिटिकल डोनेशन के साथ-साथ मेडिकल खर्च और ट्यूशन फीस के नाम पर भी फर्जीवाड़ा शामिल है। यह खेल खास तौर पर बड़े शहरों में चल रहा था, जहां लोग रसूख का इस्तेमाल कर टैक्स चोरी कर रहे थे।

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80GGC के तहत पॉलिटिकल पार्टियों या इलेक्टोरल ट्रस्ट को दिए गए दान पर टैक्स में छूट मिलती है। लेकिन सूत्रों ने बताया कि कई बिचौलियों ने इस छूट का गलत फायदा उठाया।

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क्या है 80GGC और कैसे बना भ्रष्टाचार का रास्ता?
आयकर अधिनियम की धारा 80GGC के तहत यदि कोई व्यक्ति या संस्था मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को चंदा देती है, तो वह रकम टैक्स से पूरी तरह छूट के योग्य होती है। इस प्रावधान को पारदर्शी राजनीतिक फंडिंग को बढ़ावा देने के लिए लाया गया था। लेकिन अब जो मॉडल सामने आ रहा है, वह चिंताजनक है:

  • कुछ कंपनियां और दलाल नेटवर्क ऐसे लोगों से संपर्क करते हैं जो नकली दानदाता बनने को तैयार होते हैं।
  • फिर उन्हें एक निश्चित कमीशन पर चंदा देने वाला दिखाकर उनके नाम से फर्जी रसीद बनाई जाती है।
  • बदले में राजनीतिक पार्टी को ‘डोनेशन’ दिखा कर टैक्स छूट ली जाती है — या कालेधन को सफेद कर लिया जाता है।

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किन शहरों में हुई छापेमारी?
दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता, जयपुर, अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में यह छापेमारी हुई है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यह छापेमारी उन इकाइयों पर केंद्रित थी जिन्होंने पिछले दो वित्तीय वर्षों में असामान्य रूप से बड़े राजनीतिक चंदे का दावा किया, लेकिन जिनके पास कोई वैध व्यापारिक गतिविधि नहीं है।

डिजिटल ट्रेसिंग से पकड़ा गया जाल
इस पूरे मामले में डिजिटल फंड ट्रांसफर और बोगस रसीदों के विश्लेषण ने अहम भूमिका निभाई। वित्तीय खुफिया इकाइयों ने पाया कि एक ही IP से कई फर्जी दानदाता बनाए गए। कुछ मामलों में पैन कार्ड नंबर ऐसे व्यक्तियों के इस्तेमाल हुए जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या जिनकी इनकम टैक्स फाइलिंग सालों से बंद थी।

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वित्त मंत्रालय के मुताबिक यह केवल शुरुआत है। कुछ मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भी एंट्री हो सकती है, क्योंकि राजनीतिक चंदा मनी लॉन्ड्रिंग का एक गुप्त रास्ता बन चुका है। साथ ही, यह बहस भी फिर शुरू हो गई है कि क्या 80GGC जैसी छूटें अब सिर्फ पारदर्शिता के बजाय भ्रष्टाचार को संस्थागत बना रही हैं?

बताते चलें, अगर वाकई नतीजों तक पहुंचती हैं, तो यह भारत की राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। लेकिन अगर कुछ दिनों बाद यह मामला भी दूसरे घोटालों की तरह ‘खो’ गया, तो यह 80GGC नहीं बल्कि लोकतंत्र की जवाबदेही पर सबसे बड़ा सवाल होगा।

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